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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 43)

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 43)

राजा शर्मा

Copyright@2018 राजा शर्मा Raja Sharma

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 43)

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दो शब्द

भगवान् को चिट्ठी Bhagwaan Ko Chitthi

मंत्रिपद ठुकरा दिया Mantripad Thukra Diya

राजा, तुम सिपाही बन जाओ! Raja, Tum Sipahi Ban Jao!

उत्तर "नहीं" है Uttar "Nahi" Hai

नौकर भी इंसान हैं Naukar Bhi Insaan Hain

प्यार पैसे से ऊपर है Pyar Paise Se Upar Hai

आँखों से पढ़ लेना Ankhon Se Padh Lena

तीन प्रश्न Teen Prashan

कानून के सामने Kanoon Ke Saamney

चिड़िया और फूल Chidiya Aur Phool

सम्राट का मुंडन करो Samrat Ka Mundan Karo

इस तरह प्राप्त हुआ ज्ञान Is Tarh Praapt Hua Gyan

एक चोर था Ek Chor Tha

तीन बहनें Teen Bahanein

कौन बड़ा कौन छोटा Kaun Bada Kaun Chota

भतीजी भारी पड़ी Bhateeji Bhari Padi

मेरी भाषा तेरी भाषा Meri Bhasha Teri Bhasha

अन्ना हज़ारे से मिलना था Anna Hazare Se Milna Tha

खाना पीना निजी मामला Khana Peena Niji Mamla

भिखारी का कटोरा Bhikhari Ka Katora

अब कबूतर फंस गए Ab Kabootar Fans Gaye

ये औरत वो औरत Ye Aurat Wo Aurat

सब एक से नहीं होते Sab Ek Se Nahi Hotey

जीवन ही बदल दिया Jeevan Hi Badal Diya

खूंखार निरंकुश बादशाह Khoonkhaar Nirunkash Badshah

दार्शनिक कन्फूशियस Darshnik Confucious



दो शब्द


विश्व के प्रत्येक समाज में एक पीढ़ी द्वारा नयी पीढ़ी को कथाएं कहानियां सुनाने की प्रथा कई युगों से चलती चली आ रही है. प्रारंभिक कथाएं बोलकर ही सुनायी जाती थी क्योंकि उस समय लिखाई छपाई का विकास नहीं हुआ था. जैसे जैसे समय बीतता गया और किताबें छपने लगी, बहुत सी पुरानी कथाओं ने नया जीवन प्राप्त किया.


इस पुस्तक में हम आपके लिए 25 प्रेरणा कथाएं लेकर आये हैं. यह इस श्रंखला की तैंतालीसवीं पुस्तक है. हर कथा में एक ना एक सन्देश है और इन कथाओं में युवा पाठकों, विशेषकर बच्चों, के दिमाग में सुन्दर विचार स्थापित करने की क्षमता है. ये पुस्तक आपको निराश नहीं करेगी क्योंकि ये कहानियां दुनिया के विभिन्न देशों और समाजों से ली गयी हैं.


कहानियां बहुत ही सरल भाषा में प्रस्तुत की गयी हैं. आप अपने बच्चों को ऐसी कहानियां पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करके उनपर बहुत उपकार करेंगे. आइये मिलकर कथाओं की इस परम्परा को आगे बढ़ाएं.


बहुत धन्यवाद


राजा शर्मा


भगवान् को चिट्ठी Bhagwaan Ko Chitthi


घाटी की एक छोटी सी पहाड़ी की चोटी पर वही एक घर था. उस ऊंचाई से फसल से भरे हुए खेत के पास से होकर जाती हुई नदी दिखती थी.


परन्तु जमीन को वर्षा का बहुत ही बेसब्री से इंतजार था. कम से कम एक बौछार तो हो ही जानी चाहिए थी.


लेंचो ने पूरे दिन आकाश की तरफ देखने के सिवा अपने खेत में कुछ भी नहीं किया था. उसने कहा, "अब तो सच में ही पानी पड़ेगा."


उसकी पत्नी खाना बनाते बनाते बोली, "हाँ, अगर भगवान् ने चाहा तो ऐसा ही होगा."


उनके बड़े बेटे खेत में काम कर रहे थे और छोटे बेटे घर के पास ही खेल रहे थे. उसकी पत्नी ने आवाज़ देकर कहा, "आ जाओ, खाना तैयार है!"


खाना खाने के दौरान, जैसे के लेंचो ने भविष्यवाणी की थी, वर्षा की मोटी मोटी बूँदें गिरने लगी. उत्तर पश्चिम में बहुत विकराल बादल प्रकट हो गए थे.


हवा ताज़ा और मधुर हो गयी थी. लेंचो उठकर बाहर जाकर उस बदले मौसम का आनंद लेने लगा.


जब वो वापिस घर में आया, वो जोर से बोला, "ये वर्षा की बूँदें नहीं हैं, नए सिक्के हैं! बड़ी बूँदें दस दस सेंटावो के सिक्के हैं और छोटी बूँदें पांच पांच सेंटावो के सिक्के हैं. (मेक्सिको की पैसे की एक इकाई को सेंटावो कहते हैं.)



अपने मकई के खेत और मटरों के फूलों को बारिश में भीगते हुए देखकर उसको एक असीमित संतोष का आभास हुआ. अचानक बहुत तेज तूफ़ान शुरू हो गया और बड़े बड़े ओले गिरने लगे.


वो बड़े बड़े ओले वास्तव में चांदी के सिक्के से लग रहे थे. उनके बच्चे बाहर बारिश में आकर ओले इकट्ठे करने लगे.


लेंचो ने अचानक भयभीत होते हुए कहा, "ये तो अब बहुत ही खराब हो रहा है. मैं आशा करता हूँ के ओलावृष्टि जल्दी ही रुक जाएगी."


लेकिन ओलावृष्टि रुकी नहीं. एक घंटे तक ओले गिरते रहे. उनके घर, बगीचे, पहाड़, मकई के खेत, और पूरी घाटी ही ओलों से भर गयी थी. सब तरफ सफ़ेद सफ़ेद ओले ही दिख रहे थे.


पेड़ों पर अब एक भी पत्ती नहीं दिख रही थी. मटर की फसल के सब फूल गायब हो चुके थे. लेंचो की तो आत्मा ही दुःख से भर गयी.


जब तूफ़ान समाप्त हुआ, वो अपने खेत के बीचो बीच अपने बेटों के साथ खड़ा था. उसने अपने बेटों से कहा, "अगर टिड्डियों का हमला भी हुआ होता तो इतना नुक्सान तो नहीं होता.


इन ओलों ने तो कुछ भी बाकी नहीं छोड़ा है. सब बर्बाद हो गया है. इस बरस हमारे पास ना तो मकई होगी और ना मटर."


वो रात उन सबके लिए दुःख भरी थी. वो दुःख से बोला, "हमारी सारी मेहनत बर्बाद हो गयी! अब कोई भी हमारी मदद नहीं कर सकेगा! इस बरस हमको भूख का सामना करना पड़ेगा!"


फिर भी पहाड़ के ऊपर उस छोटे से घर में अभी भी एक आशा बाकि थी: भगवान् के द्वारा सहयोग की आशा.


लेंचो ने कहा, "इतने विचलित होने की जरूरत नहीं है भले ही ऐसा लग रहा है के सब बर्बाद हो गया है. याद रखो, भूख से कोई नहीं मरता है! कहते हैं न भगवान् सबका पेट भरते हैं!"


पूरी रात लेंचो उस एक आशा के बारे में ही सोचता रहा. उसको बचपन से ही सिखाया गया था के भगवान् सबपर अपनी निगाह रखते हैं.


लेंचो अपने खेत पर बहुत ही परिश्रम करता था. वो वास्तव में एक बैल की तरह काम करता था, परन्तु उसको ठीक से लिखना नहीं आता था.


अगले इतवार सुबह सुबह, अपने आप को विश्वास दिलाने के बाद के उनकी कोई रक्षा करने वाला था, लेंचो ने बैठ कर एक चिट्ठी लिखनी शुरू की.


उसने सोच लिया था के वो चिट्ठी लिखकर अपने हाथ से शहर के डाकखाने में देकर आएगा. वो भगवान् को लिखी गयी चिट्ठी से कम नहीं थी.


उसने लिखना शुरू किया, "भगवान्, अगर आप मेरी मदद नहीं करेंगे, मेरा परिवार और मैं इस वर्ष भूखे रह जाएंगे.

मुझे एक सौ पेसो (मेक्सिको का एक रूपया.


एक मेक्सिकन पेसो साढ़े तीन भारतीय रूपए के बराबर होता है) चाहिए हैं ताकि मैं खेत में फिर से बीज बो सकूं. मुझे फसल तैयार ना होने तक खाना खाने के लिए पैसे चाहिए हैं. ओला वृष्टि के कारण..."


उसने चिट्ठी के लिफाफे पर लिखा "भगवान् को..." और फिर चिट्ठी उस लिफाफे में रख दी. वो अभी भी बहुत ही दुखी था. वो शहर गया और डाकखाने में उस लिफाफे पर एक टिकट चिपका दी और उसको डाक डालने वाले बक्से में डाल दिया.


डाकखाने में काम करने वाले एक व्यक्ति ने हँसते हँसते वो चिट्ठी अपने अफसर को दिखाई. उस चिट्ठी पर लिखा था 'भगवान् को..." उस डाकिये को भगवान् का पता तो मालूम नही था.


उस डाकखाने का पोस्टमॉस्टर एक मोटा आदमी था, बहुत ही मिलनसार. वो पोस्टमॉस्टर भी हंसने लगा, परन्तु वो तुरंत ही गंभीर हो गया. चिट्ठी उसके डेस्क पर ही थी.


उसने कहा, "क्या विश्वास है! काश मेरे पास भी इस चिट्ठी लिखने वाले व्यक्ति जितना विश्वास होता! मैं भी भगवान् पर उतना ही विश्वास करता जितना चिट्ठी लिखने वाला करता है!


काश मैं भी इतनी आशा करता! काश मैं भी भगवान् को चिट्ठी लिख सकता!" पोस्टमॉस्टर जानता था के वो चिट्ठी उस पते पर तो भेजी ही नही जा सकती थी. उसके दिमाग में एक विचार आया. उसने उस चिट्ठी का उत्तर देने का निर्णय लिया.


जब उसने चिट्ठी खोली और पढ़ी उसको आभास हो गया के जवाब देना ही पर्याप्त नहीं था. फिर भी उसने जवाब देने का संकल्प लिया. उसने अपने कर्मचारी से पैसे मांगे.


उसने अपनी तनख्वाह से भी कुछ पैसे दे दिए. उसके कुछ दोस्तों ने भी थोड़े थोड़े पैसे दे दिया. वो सभी दान पुण्य का काम करने जा रहे थे.


एक सौ पेसो इकट्ठे करना इतना आसान नहीं था. फिर भी उसने पचास पेसो से कुछ ज्यादा उस किसान को भेज दिए. उसने रूपए एक लिफाफे में रखे और लेंचो के पते पर भेज दिए. उसने लिफाफे के नीचे लिख दिया "भगवान्."


अगले इतवार लेंचो खेत से थोड़ा जल्दी आ गया और डाकखाने जाकर पूछा के क्या उसकी कोई चिट्ठी आयी थी. डाकिये ने अपने हाथ से उसको चिट्ठी दे दी.


पोस्टमॉस्टर ने लेंचो के चेहरे पर संतोष की झलक देखी. पोस्टमॉस्टर को भी अपने द्वारा किये गए अच्छे काम से ख़ुशी मिलने लगी. वो अपने दफ्तर के दरवाजे से लेंचो को देख रहा था.


लेंचो के चेहरे पर आश्चर्य के भाव बिलकुल भी नहीं थे. वो पैसे गिन रहा था. अचानक वो गुस्सा हो गया.


वो जानता था के भगवान् तो पैसे भेजने में गलती कर ही नहीं सकते थे. उसने एक सौ पेसो मांगे थे तो फिर भगवान् कैसे कम पैसे भेज सकते थे?


लेंचो ने डाकिये से एक कागज़ और कलम लेकर फिर से एक चिट्ठी लिखी और उसको लिफाफे में रखकर लिफाफे पर एक टिकट चिपका दी और वो चिट्ठी बक्से में डाल दी. कुछ ही देर में वो चिट्ठी फिर से पोस्टमॉस्टर के सामने पड़ी थी.


चिट्ठी में लिखा था, "भगवान्, मुझे आपके भेजे हुए सिर्फ पिछत्तर पेसो ही मिले हैं. मुझे बाकी के पैसे भी भेज दीजिये क्योंकि मुझे बहुत सख्त जरूरत है. मुझे वो पैसे डाक से मत भेजिएगा, क्योंकि डाकखाने में काम करने वाले लोग बेईमान हैं.


लेंचो."


मित्रों,


कभी कभी किसी का भला करना भी उल्टा अपने ऊपर ही भारी पड़ जाता है. बेचारा पोस्टमॉस्टर और उसके दोस्तों ने मिलकर पैसे इकट्ठे किये थे और लेंचो को भेज दिए थे, परन्तु लेंचो ने उनको ही बेईमान कह दिया था.


ऐसा विश्वास भी बहुत ही खतरनाक होता है. व्यक्ति चाहे अनपढ़ ही हो, कम से कम समझदार तो होना ही चाहिए.


मंत्रिपद ठुकरा दिया Mantripad Thukra Diya


पीटर क्रोपोत्किन को रूस के एक महान सामाजिक कार्यकर्ता, क्रन्तिकारी, वैज्ञानिक, और दर्शनशास्त्री के रूप में जाना जाता है.


उनके पिता शाही खानदान से ताल्लुक रखते थे और वो एक बहुत बड़े जमींदार थे. उस समय रूस में अमीरों के घरों में बहुत से गुलाम होते थे.


पीटर बचपन से ही अपने गुलामो के साथ होने वाले दुर्व्यवहार को देखते चले आये थे. वो उनके साथ होने वाले अत्याचार को कभी भी मान्यता नहीं देते थे और बहुत बार उनके मन में विद्रोह की भावना जन्म लेती थी.


उनकी पढाई लिखाई भी बहुत ही उच्च स्तर के स्कूल और विद्यालय में हुई थी. बचपन से ही उनके मन में सुसंस्कार के बीज अंकुरित होने लगे थे.


उन्होंने अपने कॉलेज में भूगोल और विज्ञान का अध्ययन किया. उन्होंने ही एशिया के नक़्शे में सुधार किया था.


पढाई करने के बाद उन्होंने फ़िनलैंड जाकर वहां पर पाए जाने वाले ग्लेशियरों का अध्ययन किया और नए सिद्धांतों को भी तैयार किया.


विज्ञानं की दुनिया में उनका बहुत नाम हुआ. बहुत ही सफल और अमीर वैज्ञानिक होने के बावजूद भी वो हमेशा रूस में गुलामों के बारे में ही सोचते रहते थे.


उन्होंने देश में स्वतंत्रता को नए सिरे से रेखांकित करने का प्रण किया. उन्होंने अपना पूरा जीवन ही इस उद्देश्य के लिए लगा दिया.


वो वैज्ञानिकों के साथ भी काम करते थे, पर साथ ही साथ वो किसान का वेश धारण करके किसानो के बीच जाकर उनको उनको अधिकार समझते थे. वो चाहते थे के किसान और गरीब लोग स्वतंत्र जीवन बिताएं.


उनको अपने इस सामाजिक सुधार के कार्य के कारण बहुत बार जेल भी जाना पड़ा. अपने कुछ दोस्तों के सहयोग से वो एक बार जेल से भाग गए और स्विट्ज़रलैंड पहुँच गए.


वहां पर उन्होंने समाविष्टवाद की अनेक शाखाओं का गंभीर अध्ययन किया. उन्होंने अराजकवादी साम्यवाद पर बहुत से ग्रन्थ भी लिखे.


वो अपने सिद्धांतों और अपनी लिखी पुस्तकों के प्रचार के लिए फ़्रांस गए पर वहां भी उनको जेल में समय बिताना पड़ा. जब वो फ़्रांस की जेल से छूटे वो इंग्लैंड चले गए.


बड़े-बड़े बोरों में साम्यवाद का साहित्य भर कर वे रूस भेजते थे. यहां उनके सहयोगी प्रचार-कार्य करते जाते थे.


रूसी क्रांति की सफलता के बाद जब वह देश वापस लौटे तो रूस ने उन्हें हाथों-हाथ लिया और उनका बहुत अधिक स्वागत सम्मान हुआ.


सरकार ने उन्हें शिक्षामंत्री बनने का प्रस्ताव दिया, जिसे उन्होंने विनम्रता से यह कहते हुए मना कर दिया कि पद लेना उनके सिद्धांतों के खिलाफ होगा.


उन्होंने मंत्रिपद तो ठुकराया ही अपने पूरे जीवन कोई भी सरकारी पद स्वीकार नहीं किया.


वो सारे जीवन गरीब, शोषित, और नीचे के वर्ग के लोगों के उत्थान के लिए संघर्ष करते रहे. ऐसे ही महान समाज सुधारकों के कारण ही रूस जैसे शक्तिशाली देश अस्तित्व में आये हैं.


मित्रों,


दुनिया के इतिहास को पढ़ने के बाद आप ये पाएंगे के विश्व में जितने भी बड़े बड़े परिवर्तन हुए हैं उनके पीछे मुट्ठी भर लोग ही थे. ऐसे लोग संघर्ष करते थे और अपना पूरा जीवन औरों के उत्थान में लगा देते थे.


समाज में बड़े बड़े परिवर्तन लाने वाले लोग किसी स्वार्थ, पद, या सम्मान के कारण लोगों की सेवा या उनके उत्थान के लिए संघर्ष नहीं करते थे, बल्कि वो तन मन धन से ही दुनिया को और भी सुन्दर बनाने के लिए समर्पित होते थे.


राजा, तुम सिपाही बन जाओ! Raja, Tum Sipahi Ban Jao!


बहुत समय पहले एक बहुत ही पहुंचे हुए संत थे. एक बार वो अपनी यात्राओं के दौरान काशी से चलते चलते उज्जैन पहुँच गए. वहां के लोग पहले से ही उनकी ख्याति के बारे में सुन चुके थे.


उनके उज्जैन में आगमन की बात उज्जैन के राजा तक भी पहुँच गयी. वो भी संत जी से आशीर्वाद लेने के लिए नदी किनारे संत जी के दर्शन करने को पहुँच गए.


संत जी ने राजा से कहा, "राजा, तुम सिपाही बन जाओ!" इसके अलावा संत जी ने कुछ भी नहीं कहा. राजा को अच्छा तो नहीं लगा पर वो अपने महल में वापिस चला गया.


अगले दिन उस राजा के प्रधान पंडित जी संत जी से आशीर्वाद लेने को आये. संत जी ने प्रधान पंडित जी से कहा, "पंडित जी, आप अज्ञानी बन जाएँ!" पंडित जी को भी गुस्सा आया पर वो भी चुपचाप वापिस चले गए.


तीसरे दिन उस उज्जैन नगर का सबसे अमीर व्यक्ति संत जी के दर्शन करके उनका आशीर्वाद लेने पहुँच गया. संत जी ने उस अमीर व्यक्ति को कहा, "आप सेवक बन जाएँ!" वो अमीर व्यक्ति भी अप्रसन्न हुआ पर चुप चाप चला गया.


अगले दिन दरबार में संत जी के दिए हुए आशीर्वादों की चर्चा होने लगी. किसी भी दरबारी या मंत्री को संत जी के द्वारा दिए गये आशीर्वाद अच्छे नहीं लगे थे. उन्होंने निर्णय लिया के वो संत कोई संत नहीं कोई धूर्त व्यक्ति था.


राजा ने अपने सिपाहियों को भेज कर संत जी को पकड़ कर दरबार में लाने का आदेश दिया. कुछ देर में ही सिपाही संत जी को बंदी बना कर दरबार में ले आये.


राजा ने गुस्से से संत जी को कहा, "आपने हम लोगों को आशीर्वाद देने के बहाने हमारा अपमान किया है. आपको इसके लिए दंड दिया जाएगा."


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