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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 34)

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 34)

राजा शर्मा

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 34)

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दो शब्द

घर वापसी Ghar Vapsi

आपको भी बूढा होना है Aapko Bhi Boodha Hona Hai

तीर्थयात्रा सफल हुई Teerthyatra Safal Hui

शत्रु को हराना Shatru Ko Harana

ऐसे थे गांधीजी Aise The Gandhiji

ऐसा भी नेक इंसान Aisa Bhi Nek Insaan

सही चुनना Sahi Chunana

मनमौजी Manmauji

जल्दी मैं छयासठ का हो जाऊंगा Jaldi Main Chyasath Ka Ho Jaunga

सुक़ून Sukoon

सुधरने को तैयार नहीं Sudharney Ko Taiyar Nahi

संघर्ष की चिंगारी Sangharsh Ki Chingari

कक्षा में चुटकुले Kaksha Mein Chutkuley

देश का पैसा Desh Ka Paisa

कामयाबी मिलती है Kamyabi Milti Hai

चिट्ठियां Chitthiyaan

दिल से, वियतनाम से Dil Se, Vietnam Se

इधर या उधर Idhar Ya Udhar

ऐसा हो परोपकार Aisa Ho Paropkar

होंडा की सफलता Honda Ki Safalta

खंभे के साथ बांध दो Khambhe Ke Saath Baandh Do

नमक भूल गई हैं Namak Bhul Gayee Hain

दीनबंधु Deenbandhu

आदतों को छोड़ना Adton Ko Chodna

यही इंसानी धर्म है Yahi Insani Dharm Hai



दो शब्द


विश्व के प्रत्येक समाज में एक पीढ़ी द्वारा नयी पीढ़ी को कथाएं कहानियां सुनाने की प्रथा कई युगों से चलती चली आ रही है. प्रारंभिक कथाएं बोलकर ही सुनायी जाती थी क्योंकि उस समय लिखाई छपाई का विकास नहीं हुआ था. जैसे जैसे समय बीतता गया और किताबें छपने लगी, बहुत सी पुरानी कथाओं ने नया जीवन प्राप्त किया.


इस पुस्तक में हम आपके लिए 25 प्रेरणा कथाएं लेकर आये हैं. यह इस श्रंखला की चौंतीसवीं पुस्तक है. हर कथा में एक ना एक सन्देश है और इन कथाओं में युवा पाठकों, विशेषकर बच्चों, के दिमाग में सुन्दर विचार स्थापित करने की क्षमता है. ये पुस्तक आपको निराश नहीं करेगी क्योंकि ये कहानियां दुनिया के विभिन्न देशों और समाजों से ली गयी हैं.


कहानियां बहुत ही सरल भाषा में प्रस्तुत की गयी हैं. आप अपने बच्चों को ऐसी कहानियां पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करके उनपर बहुत उपकार करेंगे. आइये मिलकर कथाओं की इस परम्परा को आगे बढ़ाएं.


बहुत धन्यवाद


राजा शर्मा


घर वापसी Ghar Vapsi


क्या उलझे हुए संबंधों की देर तक रहने वाली खुशबू आपने कभी महसूस की है? क्या कभी आपने टूटे हुए दिल की मीठी दुखायी को गले से लगाया है?


सरताज सिंह ने मुझे इन्ही प्रश्नो के साथ छोड़ दिया था. उनकी आंखें मैंने आज तक देखी हुई सबसे मासूम आंखें थी.


हम एक दूसरे से दिल्ली की अपनी रेल यात्रा के दौरान मिले थे. मैं एक राष्ट्रीय समाचारपत्र में सहायक सम्पादक के पद पर काम करने जा रही थी. मेरा दफ्तर मेरे जहाज के टिकट के पैसे भी दे देता, परन्तु मुझे रेल से यात्रा करना ज्यादा अच्छा लगता था.


शायद उस यात्रा के दौरान उस शानदार व्यक्ति से मिलना मेरे भाग्य में लिखा था. जितने वो शानदार थे उससे शानदार उनकी कहानी थी जो उन्होंने मुझको सुनायी.


वो रेल के डिब्बे में अपनी सीट पर हाथ में एक उपन्यास लिए बैठे थे. किताब का कवर किनारों से फटा हुआ था और किताब बहुत ही पुरानी लग रही थी.


उन्होंने मुझे तुरंत ही हेलो कहा और मैंने भी तुरंत ही जवाब दिया. बम्बई से दिल्ली की लम्बी यात्रा थी और मैं सरताज सिंह को एक साथी के रूप में पाकर खुश हुई.


मेरी जिंदगी में कई लोग समय समय में आये थे और बहुत से खट्टे मीठे अनुभव भी थे पर उस दिन मैं उस व्यक्ति को अपने सहयात्री के रूप में पाकर खुश हुई.


मैंने अपना गला साफ़ करते हुए कहा, "आप कहाँ तक जा रहे हैं?"


उन्होंने मुझे देखते हुए कहा, "जी, दिल्ली."


"घर?"


वो थोड़ा सा मुस्कुराये और फिर बोले, "हाँ, आप ये कह सकती हैं."


"जैसे के?"


"मिस, वास्तव में ये घर क्या होता है? चार दीवारें जहाँ आपको आराम मिलता है और आप जहाँ रहना शुरू कर देते हैं या जहाँ आप अपने प्रेमी या प्रेमिका को वापिस आकर मिलने की आशा रखते हैं?"


मैंने हिचकिचाते हुए कहा, "दूसरा वाला, मेरा मतलब जहां कोई आपका इंतजार कर रहा हो."


वो बोले, "फिर तो बम्बई मेरा घर है जहाँ मेरी प्रिये हमेशा के लिए सो गयी."


मैं बोली, "ओह, मुझे माफ़ कर दीजियेगा. मुझे नहीं मालूम था."


"माफ़ी, क्यों? सॉरी कहने की जरूरत नहीं है. बेनज़ीर मेरे दिल में रहती है," उन्होंने अपनी छाती पर बाएं तरफ हाथ रखते हुए कहा.


मैं उनकी तरफ देख कर मुस्कुराने की कोशिश करने लगी. मैंने फिर कोशिश की, "तो मेरा मतलब, आपकी पत्नी कैसे...शायद पत्नी .........कैसे?"


वो बोले, "नहीं शादी नहीं हुई. आपका नाम क्या है, बेटाजी?"


मैंने जवाब दिया, "जी, तानीमा."


उन्होंने कहा, "नहीं मैंने कभी शादी नहीं की. वो मेरी पत्नी नहीं थी. बेनजीर मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी, मेरी प्रेमिका थी, मेरी आत्मा थी. पत्नी को छोड़कर वो मेरे लिए सबकुछ थी. मेरा दिल उसका था और उसका दिल मेरा. साठ साल हम दोनों दोस्त रहे."


"आपने उनसे शादी क्यों नहीं की?"


"एक व्यक्तिगत बाधा थी, मैं बहुत ही शर्मीला था. जब मैंने हिम्मत की तो धर्म बाधा बन गया और हम दूर होने लगे और फिर अंत में मृत्यु उसको ले गयी. हमको शादी करने का मौका ही नहीं मिला."


"जी, मैं समझी नहीं," मेरी जिज्ञासा बहुत बढ़ चुकी थी.


उन्होंने कहा, "हमारी यात्रा बहुत लम्बी है, चलो मैं तुमको एक कहानी सुनाता हूँ." मैं ऐसे बैठ कर सुनने लगी जैसे मैं उनको बहुत लम्बे समय से जानती थी.


वो बोलने लगे, "१९५० के शुरू के दिनों में मेरी माँ का निधन हो गया था. मैं पटियाला से दिल्ली काम की तलाश में आ गया. मैं चौदह साल की उम्र में अनाथ हो गया था. दिल्ली आते ही पहले हफ्ते में ही मेरी मुलाकात एक बहुत अच्छे परिवार से हुई.


कीरत सिंह एक गेराज के मालिक थे. उन्होंने मुझे अपने गेराज में काम दे दिया. उन्होंने अपने बड़े बेटे के कुछ कपडे भी मुझे दे दिए. मुझे एक खटिया और एक कम्बल भी दिया गया. जो कुछ भी वो सब लोग खाते थे मुझे भी देते थे. मैं उनके साथ काम करते और रहते हुए खुश था.


इस तरह दो साल बीत गए. कीरत सिंह, उनकी पत्नी, उनकी दो बेटियां, और तीन बेटे सभी त्यौहार मुझे भी साथ लेकर ही मनाते थे. कोई भी मेरे साथ बुरा व्यव्हार नहीं करता था और सभी बहुत प्रेम से बात करते थे.


उनके तीन मंजिले घर की तीसरी मंज़िल खाली थी. तीसरे वर्ष में एक मुस्लिम परिवार उस तीसरी मंजिल में रहने आ गया. वो बहुत अच्छे दिन थे जब हिन्दू, सिख, और मुसलमान सब मिलजुलकर रहते थे, भाइयों की तरह.


उस दिन मैं एक कार धो रहा था जब वो मुस्लिम परिवार एक सफ़ेद फ़िएट कार में आया. उस समय तक मैं ये नहीं जनता था के प्रेम क्या होता है.


बस मैंने उसको कार से उतरते देखा और मैं उसको प्रेम करने लगा. मैंने न तो प्रेम कहानियां पढ़ी थी और ना ही कोई फिल्में देखी थी पर मुझे प्रेम हो गया.


उसने हरा कुरता सलवार पहना था और सुनहरा दुपट्टा और हरी चूड़ियां बहुत ही खूबसूरत लग रही थी. उसके दाएं गाल पर एक छोटा सा तिल था जो उसके बहुत ही खूबसूरत चेहरे को और भी खूबसूरत बना रहा था.


वही बेनजीर थी, पर उसको ये नहीं मालूम था के मैं उसको ही देख रहा था. वो कार से उतर कर बैग उठा कर अपने बड़ों के साथ घर के अंदर चली गयी. उसके छोटे भाई ने उसका हाथ पकड़ रखा था. मैं तो बहुत ही उत्तेजित था. मैं बैग उठाने में उनकी मदद करने को आगे बढ़ा.


मैंने तीसरी मंजिल के उनके नए घर की सफाई करने में भी उन सबका बहुत साथ दिया. बेनजीर के पिताजी को मैं बहुत अच्छा लगा और उन्होंने मेरा परिचय परिवार के सभी सदस्यों से करवाया.


उस समय बेनजीर पहली बार मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई थी. मैं घबरा गया था. मैंने अपना सर नीचे कर लिया था. मुझे बहुत ही शर्म आ रही थी.


उस गेराज में मेरे साथ एक और लड़का पिंटू भी काम करता था. उस रात मैंने खटिया पर लेटे लेटे ही उसको पूछा, "यार, ये प्यार क्या होता है? क्या तुम जानते हो इंसान को कब प्यार हो जाता है?"


पिंटू ने कहा, "हाँ भाई साहब, जब मैं चाचाजी जी के पोस्टर को देखता हूँ तो मुझे अहसास होता है के चाचाजी हमको प्यार करते हैं." उसने जवाहरलाल नेहरू जी की फोटो की तरफ संकेत करते हुए कहा.


उसने फिर से कहा, "चाचा नेहरू हम सबको प्रेम करते हैं और उन्होंने हमको आज़ादी दिलवाई."


मैंने कहा, "नहीं यार, वो वाला प्यार नहीं. मेरा मतलब है किसी लड़की से प्यार. जैसे धर्मेंद्र अपनी प्रेमिका को प्रेम करता है और उसके लिए लड़ता है."


पिंटू तुरंत ही उठ कर बैठ गया, "भाई जी, क्या बात कर रहे हो आप? क्या आपको किसी से प्यार हो गया है? मुझे बताओ न.क्या आप शादी करके कीरत जी की तरह पांच बच्चे पैदा करने को तैयार हैं?"


पिंटू सिर्फ दस बरस का था पर बातें बहुत बड़ी बड़ी करता था. वो तो मेरे परिवार तक पहुँच गया था. मैंने उसको सोने को कहा और खुद भी कम्बल ओढ़ कर सो गया. इस तरह मेरा बेनजीर के साथ एक तरफ़ा प्रेम शुरू हो गया.


मैं उनकी कहानी को बहुत ही रूचि लेकर सुन रही थी.ऐसा लग रहा था के मैं इतिहास की किताब के कुछ पन्ने पलट रही थी. तभी एक वेटर हमारे डब्बे में खाने के आर्डर लेने को आया. उसने हमारे लंच के आर्डर लिए और चला गया. मैंने उनको कहा, "जी, आगे बताइये ना."


उन्होंने थोड़ा पानी पिया और फिर बोले, "हाँ हाँ, मुझमें बहुत परिवर्तन आ गए थे. मैं सुबह जल्दी उठने लगा और तुरंत तीसरी मंजिल पर जाने लगा ताकि देख लू के मिस्टर खान को मेरी मदद की जरूरत तो नहीं थी.


मैं उनके लिए सुबह सुबह दो पैकेट दूध और एक समाचारपत्र भी लाने लगा. इस बहाने मैं बेनजीर को भी देख लेता था.


उसके घर वाले नहीं चाहते थे के बेनजीर अकेले स्कूल जाए. मैं तुरंत ही उसको रोज स्कूल पहुँचाने और वापिस लाने के लिए तैयार हो गया. वो भी खुश थी. इस तरह हम दोनों में बातचीत शुरू हो गयी.


वो इतनी शर्मीली नहीं थी.वो मुझे मेरे नाम से बुलाती थी. वो मुझसे मेरे परिवार के बारे में और मेरे गाँव के बारे में पूछती थी. उसने ये भी पूछा के मैं दिल्ली कैसे आया था.


अगले तीन महीनो में मैं और बेनजीर अच्छे दोस्त बन गए. हम दोनों अब एक दूसरे को देखते ही मुस्कुराने भी लगे थे. इस तरह तीन बहुत सुन्दर वर्ष बीत गए. १९५६ में मैं १८ वर्ष का हो गया था और मैं प्रेम की भाषा में भी निपुण हो गया था.


१९५६ की दिवाली में कीरत सिंह जी की पत्नी ने मुझे एक नया कुरता उपहार में दिया. मैं उस दिन नहा धो कर नया कुरता पहन कर तैयार हो गया.


उस दिन मैंने बेनजीर से अपने प्रेम की बात कहने का निर्णय ले लिया था. उस दिन दोनों परिवार खाने पीने और मिलकर त्यौहार मनाने में मस्त थे और मेरे लिए मौका अच्छा था.


मैं जब ऊपर उनके घर गया वहां कोई भी नहीं था. मैं नीचे आने ही वाला था के तभी अपने लम्बे बालों को बांधते हुए बेनजीर बैडरूम से बाहर आयी. मैं रुक गया, पर मेरा दिल बहुत जोर से धड़क रहा था. मुझे डर था के कहीं वो मुझे थप्पड़ ही ना मार दे.


अचानक वो बोली, "सरताज तुम इतने डरे हुए क्यों हो? ऐसा लगता है जैसे कोई भूत देख लिया हो?"


"बेनजीर, मैं...मैं...मेरा मतलब...तुम नीचे नहीं आ रही हो?"


"मैं तो आ रही हूँ, पर तुम इतने घबराये हुए क्यों हो? सब ठीक तो है ना?"


"हाँ ठीक है, पर मुझे तुम अकेले में थप्पड़ मारना."


"थप्पड़ मारुं? क्यों मैं तुमको थप्पड़ क्यों मारूंगी?"


"क्योंकि, अब तक मैं ये नहीं कह सका के मैं तुमसे प्यार करता हूँ."


वो कुछ नहीं बोली और मैं थप्पड़ का इंतजार करता रहा. मैंने कहा, "थप्पड़ नहीं मरोगी?"


"मारती अगर तुमने कहने में और भी देर की होती. क्या कोई लड़का ये कहने में इतना समय लगाता है? मैं तो सोच रही थी के तुम तो कभी भी ये कहने की हिम्मत नहीं करोगे."


"क्या? क्या मतलब? इसका मतलब तुम जानती थी?"


"हाँ, बुद्धू, मैं तो जिस दिन तुमसे प्रेम करने लगी थी उसी दिन से अल्लाह से तुमको जीवन में ऊपर उठाने के लिए प्रार्थना करती रही हूँ. तुम बड़े बन सको और मेरी देखभाल कर सको जैसे मेरे अब्बा मेरी अम्मी और बच्चों की देखभाल करते हैं."


मैं तो ख़ुशी से जैसे नाचने ही लगा. मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा, "मैं खूब परिश्रम करूंगा."


वो बोली, "मैं जानती हूँ के तुम बहुत सफल हो जाओगे."


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