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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 33)

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 33)

राजा शर्मा

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 33)

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दो शब्द

कुत्ता होने योग्य भी ना था Kutta Honey Yogya Bhi Na Tha

हीरे कंकड़ समान Heerey Kankad Samaan

परीक्षा पूर्ण हुई Pareeksha Poorn Hui

सुंदर घड़े का पानी Sundar Ghade Ka Pani

पत्नी से झगडे बन गए संत Patni Se Jhagde Ban Gaye Sant

माँ की सीख Ma Ki Seekh

पतझड़ की यादें Patjhad Ki Yaadein

बस एक किसान Bus Ek Kisaan

पत्थरों में हीरा Patharon Mein Heera

दिये पर ध्यान Diye Par Dhyaan

शत्रु पर विशवास मत करो Shatru Par Vishwaas Mat Karo

सिकंदर और सिपाही Sikandar Aur Sipahi

अपना पानी काट दिया Apna Pani Kaat Diya

स्कूल से दूर भागने वाला School Se Duur Bhagney Wala

मौन में तुमसे मिले Moun Mein Tumsey Miley

बारिश को सुनना Barish Ko Sunana

बुद्धू Buddhu

मेरी दक्षिणा Meri Dakshina

मर मिटने वाले Mar Mitney Waley

तीसरा व्यावहारिक है Teesra Vyavharik Hai

माइकल फैराडे की सादगी Michael Faraday Ki Sadgi

चंद्रशेखर सीमा Chandrashekhar Seema

निर्धन बालक Nirdhan Balak

तर्क शास्त्र का प्रारम्भ Tark Shastra Ka Prarambh

दयालु व्यक्ति Dayalu Vyakti



दो शब्द


विश्व के प्रत्येक समाज में एक पीढ़ी द्वारा नयी पीढ़ी को कथाएं कहानियां सुनाने की प्रथा कई युगों से चलती चली आ रही है. प्रारंभिक कथाएं बोलकर ही सुनायी जाती थी क्योंकि उस समय लिखाई छपाई का विकास नहीं हुआ था. जैसे जैसे समय बीतता गया और किताबें छपने लगी, बहुत सी पुरानी कथाओं ने नया जीवन प्राप्त किया.


इस पुस्तक में हम आपके लिए 25 प्रेरणा कथाएं लेकर आये हैं. यह इस श्रंखला की तैंतीसवीं पुस्तक है. हर कथा में एक ना एक सन्देश है और इन कथाओं में युवा पाठकों, विशेषकर बच्चों, के दिमाग में सुन्दर विचार स्थापित करने की क्षमता है. ये पुस्तक आपको निराश नहीं करेगी क्योंकि ये कहानियां दुनिया के विभिन्न देशों और समाजों से ली गयी हैं.


कहानियां बहुत ही सरल भाषा में प्रस्तुत की गयी हैं. आप अपने बच्चों को ऐसी कहानियां पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करके उनपर बहुत उपकार करेंगे. आइये मिलकर कथाओं की इस परम्परा को आगे बढ़ाएं.


बहुत धन्यवाद


राजा शर्मा


कुत्ता होने योग्य भी ना था Kutta Honey Yogya Bhi Na Tha


वो पांच या छे वर्ष का एक गरीब लड़का था. सांवला रंग, घुंघराले बाल, और फटे पुराने कपडे. उसके एक पाँव में घाव का एक निशान अभी तक बाकी था.


हम उसको संजय कह लेते हैं. उसको भी नहीं मालूम के उसको ये नाम किसने दिया था क्योंकि उसकी जिंदगी में कोई उसका अभिभावक, सच्चा अभिभावक, तो था ही नहीं.


एक दिन वो अपनी पुरानी खाकी नेकर पहने गर्मी में दिल्ली की सड़कों पर इधर उधर घूम रहा था. पैरों में जूते चप्पल तो थे नहीं. गरम सडकों पर उसको ऐसा लग रहा था जैसे किसी बहुत बड़े तवे पर चल रहा हो, पर अब तो इसका अभ्यास हो चुका था.


वो एक बहुत बड़े शॉपिंग काम्प्लेक्स के सामने रुक गया और दुकानों में बिकने के लिए रखी गयी चीजों को लोभ से देखने लगा. अचानक उसने एक बहुत बड़ी चमचमाती काली कार देखी.


कार उस शॉपिंग काम्प्लेक्स के सामने रुक गयी. उस कार में से एक बहुत अमीर औरत उतरी. उसने सामने की गहनों की दुकान की तरफ देखा.


संजय ने देखा के उस अमीर औरत ने ऊँची एड़ी के सैंडल और काला चश्मा पहने हुए थे. उसने एक बहुत सुन्दर छोटे से कुत्ते को उठा रखा था.


उसका ड्राइवर कुत्ते और उस औरत के सर के ऊपर एक छाता करके खड़ा था ताकि उन दोनों में से किसी को भी सूरज की गर्मी सीधी ना लगे.


उस औरत ने अपने पर्स में से एक पानी की बोतल निकाली और एक बच्चों को दूध पिलाने वाली बोतल. उसने छोटी बोतल में पानी भरा और उस कुत्ते को निप्पल से पानी पिलाने लगी. वो किसी छोटे बच्चे की तरह पानी पी रहा था.


उसने कुत्ते को चूमा और गहनों की ठंडी ठंडी दुकान के अंदर चली गयी. संजय उस कुत्ते को देखता ही रह गया. कुत्ते तो उसने अपने इलाके की झोपड़ियों के पास बहुत से देखे थे परन्तु ऐसा कुत्ता उसने कभी नहीं देखा था.


वो तो यही जानता था के कुत्ते को तो लात मारनी होती थी, दूर भगाना होता था, पर इस कुत्ते को तो उस औरत ने चूम लिया था.


वो सोचने लगा के वो खुद सुबह से कुछ खाना ढून्ढ रहा था और यहाँ इस कुत्ते को राजकुमार की तरह सुविधाएं दी जा रही थी. संजय सहन नहीं कर सका. फिर भी वो बैठ कर प्रतीक्षा करने लगा.


लगभग एक घंटे के बाद उस खूबसूरत छोटे से कुत्ते को गोदी में उठाये वो अमीर औरत गहनों की दुकान से बाहर आ गयी. कार का ड्राइवर कार को कहीं और पार्क करने चला गया था.


उस औरत ने ड्राइवर को फ़ोन किया. वो दुकान के बाहर ही एक नरम कुर्सी पर बैठ गयी. कुत्ता उसकी गोदी में आराम से था.


वो उसके सर को सहला रही थी और बीच बीच में चूम भी रही थी. कुत्ता प्यार से अपनी पूँछ हिला रहा था और उसके चेहरे को चाट रहा था. वो उससे बातें कर रही थी. वो उस कुत्ते को पोंटी कहकर बुला रही थी, "पोंटी, मेरा बेटा, मेरी जान, मेरा प्यारा बच्चा."


कुछ देर बाद ड्राइवर कार लेकर आ गया और वो अमीर स्त्री और उसका बेटा, माफ़ कीजियेगा, उसका कुत्ता, उस कार में बैठ कर चले गए.


संजय खड़ा का खड़ा रह गया. वो हैरान और परेशान था. वो अचानक मुड़ा और झोपड़पट्टी की तरफ दौड़ने लगा. वो इधर उधर मिलन चाचा को खोजने लगा. उसको मिलन चाचा एक स्थान पर बैठे हुक्का पीते हुए मिल गए.


संजय ने कहा, "मिलन चाचा, क्या आप मुझको एक पूँछ दे सकते हैं?"


"पूँछ? कैसी पूँछ?"


"मिलन चाचा, पूँछ, वैसी ही पूँछ जो रामलीला में मनु ने अपने पीछे बाँधी थी."


"ओह, बन्दर बनने के लिए कपडे?"


"हाँ, चाचा, मुझे एक पूँछ दे दीजिये."


"तू पूँछ का क्या करेगा?"


"चाचा, पूँछ से मेरा भाग्य चमक जाएगा."


मिलान चाचा बहुत ही दयालु व्यक्ति थे.. वो अपनी झोपडी के अंदर गए और बन्दर बनने के लिए कपडे और एक पूँछ ले आये. संजय ने तुरंत ही वो कपडे पहन लिए और अपनी कमर हिलाने लगा ताकि कुत्ते की तरह उसकी पूँछ भी हिलने लगे.


मिलन चाचा उसको देख कर हंसने लगे. मिलान चाचा ने कहा के वो लड़का तो पागल था. लेकिन संजय बहुत ही खुश था. वो सोच रहा था के कोई अमीर स्त्री उसको भी गोदी में उठाएगी और उसको चूमेगी. वो उसको अच्छी अच्छी चीजें खाने को भी देगी.


वो सोचने लगा के कोई अमीर स्त्री उसको भी नाम देगी और अपनी गोदी में लेकर कार में बिठाकर घुमाने ले जाएगी. वो सोच रहा था के अमीर लोग ही तो ये कर सकते थे. झोपडी वाले तो ये नहीं कर सकते थे ना.


वो बन्दर की वेशभूषा पहने ही गहनों की दुकान की तरफ दौड़ने लगा. उसने अपनी पूँछ को अपनी कमर में खोंस लिया था. वो सोच रहा था के कोई कार में आएगा, वो अपनी पूँछ हिलायेगा, और बस हो जाएगा. वो गर्मी में बहुत देर तक प्रतीक्षा करता रहा.


दो घंटे प्रतीक्षा करने के बाद वो सड़क के किनारे एक बेंच पर ही सो गया. एक घंटे के बाद एक लाठी ने उसके शरीर को हिलाया. चौकीदार उसको अपनी लाठी से उठा रहा था. वो उस गहनों की दुकान का चौकीदार था. "जाओ यहाँ से और कहीं और जाकर सो जाओ."


ठीक उसी समय एक बड़ी सी कार दूकान के सामने आकर रुकी. उसमें से एक अमीर मोटी औरत निकली.


संजय ने चौकीदार की तरफ ध्यान नहीं दिया और तुरंत ही उस औरत के सामने जाकर खड़ा हो गया और अपनी पूँछ हिलाने लगा. वो औरत डर के मारे चिल्लाती हुई फिर से अपनी कार में घुस गयी.


संजय ने अपना प्रयास नहीं छोड़ा और अपनी पूँछ हिलाता ही रहा. अचानक उसके गाल पर एक जोरदार थप्पड़ पड़ा और वो नीचे गिर गया. चौकीदार उसके सामने खड़ा था. वो औरत फिर से कार में से निकली और कुछ बड़बड़ाती हुई गहनों की दूकान में घुस गयी.


चौकीदार ने उसको उठाया और फिर कभी वहाँ ना आने की चेतावनी दी. संजय की आँखों से आंसू गिर रहे थे. वो धीरे धीरे चलने लगा और उस जगह से दूर होता चला गया. वो एक बार मुड़ा और उसने चौकीदार को देखा. चौकीदार ने उसको एक भद्दी सी गाली दी.


संजय का सपना जैसे बना था वैसे ही टूट गया. वो चलने लगा पर चौकीदार की गाली उसके कानो में गूंज रही थी, "साला, हमारी कुत्ता!"


संजय अपनी झोपडी की तरफ जाते हुए ये सोच रहा था के वो तो कुत्ता बनने के योग्य भी नहीं था.


मित्रों,


कितने ही संजय दिल्ली और अन्य बड़े शहरों की सड़कों में घूमते हुए बहुत से सपने देखते हैं, पर दुर्भाग्य के उनमें से कोई एक ही होता है जिसके सपने साकार हो जाते हैं.


बाकी सभी संजय तो झोपड़ियों में ही एड़ियां रगड़ते रगड़ते अंतिम सांस लेते हैं. कोई है जो ऐसे किसी संजय को अच्छा जीवन दे सके? जरा सोचियेगा.


हीरे कंकड़ समान Heerey Kankad Samaan


बहुत पहले संत पुरंदर नाम के एक महान संत हुए थे. वो प्रभु के सच्चे भक्त थे और विरक्त प्रवर्ति रखते थे. उनका लगभग पूरा समय गरीबों की सेवा करने और भगवान् की भक्ति में ही व्यतीत होता था. वो किसी भी प्रकार के लोभ और आकर्षण से मुक्त थे.


उन दिनों कृष्णदेव विजयनगर के राजा थे. उन्होंने भी सुना के संत पुरंदर यूँ तो गृहस्थी वाले व्यक्ति थे, परन्तु वो बिलकुल भी लोभी नहीं थे. कृष्णदेव ने और भी बहुत सी बातें संत पुरंदर के बारे में सुनी. उनको बहुत ही आश्चार्य हुआ.


राजा कृष्णदेव ने अपने मंत्री से कहा के वो संत पुरंदर जी की परीक्षा लेना चाहते थे. मंत्री और राजा ने मिलकर एक योजना बनाई. संत पुरंदर को दी जाने वाली भिक्षा के चावल में हीरे व रत्न मिलाकर दिए जाने लगे.


एक महीने तक भिक्षा के अन्न में छोटे-छोटे हीरे मिलाकर संत पुरंदर को दिए जाते रहे. महीने के अंत में राजा ने अपने मंत्री से संत का हालचाल लिया.


बातों ही बातों में राजा ने संत पुरंदर के घर जाने की सोची. अपने मंत्री को साथ लेकर और वेश बदलकर दोनों संत पुरंदर के घर जा पहुंचे.


जैसे ही दोनों ने घर का दरवाजा पार किया, अंदर से आती संत पुरंदर की पत्नी की आवाज उनके कानों में पड़ी.


वह पति से कह रही थीं, "आजकल आप किस गरीब के यहां से भिक्षा लाते हैं। वह चावलों में कंकड़ मिलाकर देता है. मैं उन्हें चुनते-चुनते परेशान हो जाती हूं."


राजा को यह देखकर बड़ा ताज्जुब हुआ कि कोठरी के एक कोने में, जहां संत की पत्नी कूड़ा फेंकती थीं, वहां उनके द्वारा दिए गए हीरों का ढेर लगा हुआ था. संत पुरंदर ने राजा को पहचान लिया.


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