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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 32)

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 32)

राजा शर्मा

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 32)

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दो शब्द

सुंदर घड़े का पानी Sundar Ghade Ka Pani

पतंगवाला Patang Wala

मेरे कुत्ते को घुमा लाओ Mere Kuttey Ko Ghumaa Lao

किराया चुका दो Kiraya Chuka Do

सौ डॉलर का शब्द Sou Dollar Ka Shabd

अधूरे पूरे Adhurey Poorey

उचित व्यवहार Uchit Vyavhaar

बेरोजगार Berojgaar

सेवा और भक्ति Seva Aur Bhakti

सोना मिलेगा Sona Milega

खेलते खेलते बने करोड़पति Khelte Khelte Baney Crorepati

मैं जनेऊ नहीं पहनूंगा Main Janeyu Nahi Pehnunga

आप भी मिठाई खाओ Aap Bhi Mithayee Khao

साधु और भोगी Sadhu Aur Bhogi

हर महीने एक वर्ष Har Mahiney Ek Varsh

धर्मग्रंथ बेच दिया Dharm Granth Bech Diya

पत्नी की डांट Patni Ki Daant

आखरी लम्हे Akhri Lamhe

भगवान् आये थे Bhagwaan Aaye The

चाणक्य झोपड़ी में रहते थे Chanakya Jhopdi Mein Rehte The

विद्रोही बालक Vidrohi Balak

औरों की भावनाएं Auron Ki Bhavnayein

पीली पत्तियों पर बैठा बूढा Peeli Pattiyon Par Baitha Boodha

मैं बूढ़ा कब हो गया? Main Boodha Kab Ho Gaya वो एक रात Wo Ek Raat


दो शब्द


विश्व के प्रत्येक समाज में एक पीढ़ी द्वारा नयी पीढ़ी को कथाएं कहानियां सुनाने की प्रथा कई युगों से चलती चली आ रही है. प्रारंभिक कथाएं बोलकर ही सुनायी जाती थी क्योंकि उस समय लिखाई छपाई का विकास नहीं हुआ था. जैसे जैसे समय बीतता गया और किताबें छपने लगी, बहुत सी पुरानी कथाओं ने नया जीवन प्राप्त किया.


इस पुस्तक में हम आपके लिए 25 प्रेरणा कथाएं लेकर आये हैं. यह इस श्रंखला की बत्तीसवीं पुस्तक है. हर कथा में एक ना एक सन्देश है और इन कथाओं में युवा पाठकों, विशेषकर बच्चों, के दिमाग में सुन्दर विचार स्थापित करने की क्षमता है. ये पुस्तक आपको निराश नहीं करेगी क्योंकि ये कहानियां दुनिया के विभिन्न देशों और समाजों से ली गयी हैं.


कहानियां बहुत ही सरल भाषा में प्रस्तुत की गयी हैं. आप अपने बच्चों को ऐसी कहानियां पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करके उनपर बहुत उपकार करेंगे. आइये मिलकर कथाओं की इस परम्परा को आगे बढ़ाएं.


बहुत धन्यवाद


राजा शर्मा


सुंदर घड़े का पानी Sundar Ghade Ka Pani


चाणक्य की कुशाग्र बुद्धि और न्याय के बारे में सभी ने कभी ना कभी तो पढ़ा ही होगा. वो सम्राट चन्द्रगुप्त के महामंत्री थे. चन्द्रगुप्त चाणक्य का बहुत सम्मान करते थे.


चाणक्य ने एक दिन महसूस किया के चन्द्रगुप्त अपने आप को औरों से श्रेष्ठ मानने लगे थे. चाणक्य सब कुछ जानते हुए भी सही अवसर की प्रतीक्षा करने लगे.


एक दिन सम्राट चन्द्रगुप्त ने व्यंग में चाणक्य से कहा, "मैं आपकी विद्वत्ता, सूझ-बूझ और चातुर्य की दाद देता हूं, परंतु अच्छा होता भगवान ने आपको सुंदर रूप भी दे दिया होता."


चाणक्य ने जान लिया कि सम्राट को अपने सौंदर्य पर घमंड हो गया है और वे सौंदर्य के सामने विद्या को तुच्छ समझने लगे हैं. पर उस समय वह चुप रह गए। थोड़ी देर बाद सम्राट से विदा लेकर अपने आश्रम आ गए.


अगले दिन उन्होंने अपने सेवक को बुलाकर कहा, "आज दरबार में महाराज के आने से पहले एक मिट्टी का घड़ा और एक सोने का घड़ा रखवा दो। दोनों घड़े शुद्ध जल से भरे होने चाहिए." समय से सम्राट आए और दरबार का कामकाज शुरू हुआ.


थोड़ी देर में सम्राट को प्यास लगी तो चाणक्य के आदेशानुसार उन्हें सोने के घड़े का पानी पेश किया गया. पानी पीते ही सम्राट को गुस्सा आ गया, "ये इतना गरम पानी हमें क्यों दिया गया?"


चाणक्य के इशारा करते ही उन्हें मिट्टी के घड़े वाला शीतल जल दिया गया. चाणक्य बोले, "महाराज, यह पानी पीकर देखें, क्या यह ठीक है?" इस बार सम्राट पानी पीकर संतुष्ट हुए।


फिर भी सम्राट ने पूछा, "वह कैसा पानी था और क्यों दिया गया वैसा पानी?"


चाणक्य बोले, "वह सोने के घड़े का पानी था. हमने सोचा, मिट्टी के कुरूप घड़े के बजाय सोने के सुंदर घड़े का पानी आपको बेहतर लगेगा." सम्राट को तुरंत पूरी बात समझ में आ गई. उन्हें जवाब मिल चुका था.


मित्रों,


विद्वान लोग कभी भी किसी व्यक्ति के मूर्खतापूर्ण प्रश्नो का तुरंत जवाब नहीं देते हैं. वो हमेशा सही अवसर की तलाश में रहते हैं जब वो ऐसे उत्तर देते हैं के घमंडी व्यक्ति जो मूर्खतापूर्ण प्रश्न पूछता है शर्म से सर झुका लेता है.


पतंगवाला Patang Wala


गली रामनाथ में एक ही पेड़ था। वह बरगद का पेड़ पुरानी मस्जिद की टूटी दीवार के बीच से निकला हुआ था। अली की पतंग उसकी टहनियों में फंस गई थी।


फटी कमीज पहने, छोटा सा अली, नंगे पैरों से गली में लगे पत्थरों को पार करता हुआ, अपने दादा के पास पहुंचा। दादा धूप में बैठा ऊंघ रहा था।


'दादाजान! मेरी पतंग गई!' दादा झटके से जगा।


'क्या मांझा टूट गया?' बूढ़े ने पूछा, 'पहले जैसी डोर अब कहां मिलती है?'


'नहीं दादाजान! पतंग बरगद के पेड़ में फंस गई।'


बुड्ढा जोर से हंसा। 'तुम्हें ठीक से पतंग उड़ाना सीखना है अभी, मेरे बच्चे! मुश्किल तो यह है कि मैं बूढ़ा हो गया हूं। तुम्हें सिखा नहीं सकता। पर तुम्हें एक नई पतंग जरूर दूंगा।'


उसने उसी समय पतले कागज और रेशम की एक नई पतंग बना धूप में सूखने के लिए रखी थी। गुलाबी रंग की हरे पुछल्ले वाली पतंग। बूढ़े ने वह अली को दे दी।


'इस पतंग को नहीं खोऊंगा, चिड़िया जैसी उड़ेगी यह पतंग।' और अपनी एड़ियों पर घूम कर, कूदता हुआ आंगन से बाहर निकल गया।


बूढ़ा धूप में बैठा सपने देखता रहा। उसकी पतंगों की दुकान कब की खत्म हो चुकी थी। कबाड़ी ने वह जगह खरीद ली थी। अपना दिल बहलाने के लिए वह पतंगें अभी भी बनाता था। बहुत कम लोग अब पतंग खरीदते थे। पतंग उड़ाने के लिए कोई खुली जगह भी नहीं रह गई थी।


बूढ़े को वह पुराना जमाना याद आता था, जब लोग पतंग लड़ाते थे, पतंगें आसमान में तेज़ी से घूमती थीं और झपट्टा मारती थीं। एक दूसरे के धागे से फंस कर खिंचती जाती थीं, जब तक कि एक पतंग कट नहीं जाती थी। बाज़ियां लगती थीं और पैसे हाथ बदलते थे।


बूढ़े ने याद किया कि कैसे नवाब साहब खुद नदी किनारे अपने दरबार के साथ आते थे और इस राजसी शौक में समय बिताते थे। तब लोगों के पास समय था। आजकल लोग दौड़ते ही रहते हैं, उम्मीदों की गर्मी लिए। किसी के पास समय नहीं है।


जब वह जवान था तो महमूद पतंग बनाने वाले के नाम से सारे शहर में जाना जाता था। उसकी कुछ विशेष सजावट वाली पतंगें उन दिनों तीन या चार रुपए तक भी बिकती थीं।


एक बार नवाब साहब के कहने पर उसने एक ख़ास क़िस्म की पतंग बनाई थी। उसमें एक कतार में लगे छोटे-छोटे काग़ज़ के गोलाकार टुकड़े एक हल्के बांस के फ्रेम से जड़े थे।


हर गोले के दोनों तरफ एक-एक घास का गुच्छा लगा दिया था, जिससे संतुलन बना रहे। सबसे ऊपर वाला गोला एक तरफ फूला हुआ था। उसके ऊपर एक अजीब सा चेहरा बना दिया था, जिसमें आंखों की जगह दो छोटे गोल शीशे जड़े थे।


गोले सिर से पूंछ तक आकार में घटते जाते थे और कुछ लहराते से थे। पतंग ऐसी लगती थी मानो कोई सांप सड़क पर रेंग रहा हो। इस बोझिल सी बनावट को ज़मीन से ऊपर उठाना बड़ी कला का काम था। सिर्फ महमूद ही उसे हवा में उड़ा सकता था।


जब नवाब साहब के सामने उड़ाने के लिए वह पतंग पेश की गई, तब अच्छी खासी भीड़ जमा हो गई थी। पहली कोशिश फ़िज़ूल गई, पतंग ज़मीन से उठी नहीं। बस काग़ज़ के गोलों ने एक रुआंसी व शिकायत भरी सरसराहट की;


हिलने से पतंग की आंखें, जो कि शीशों की बनी थीं, सूरज की रोशनी में चमक उठीं और पतंग एक जानदार चीज़ सी लगने लगी। फिर सही दिशा से हवा आई और ड्रैगन-काइट आसमान में उठ गई, इधर-उधर छटपटाते हुए वह ऊपर उठने लगी, ऊंची, और ऊंची।


जब यह बहुत ही ऊपर उठ गई, तो हाथ में पकड़ी रस्सी पर ज़ोरों का झटका लगने लगा। महमूद के लड़कों ने चरख़ी को संभाला; पतंग ज़ोर मारती रही, वह टूट कर निकलना चाहती थी, आज़ादी चाहती थी, अपने मन की मौज के अनुसार जीना चाहती थी। और आख़िरकार ऐसा ही हुआ।


रस्सी टूट गई, पतंग सूरज की तरफ लपकी, और आसमान की ओर शान से जाने लगी, फिर आंखों से ओझल हो गई। महमूद ने दुबारा वैसी पतंग नहीं बनाई। उसने नवाब साहब को एक गाने वाली पतंग बनाकर दी। जब वह हवा में उठती थी, तो वायलिन बजने की सी आवाज़ आती थी।


नवाब तो कुछ साल पहले मर चुके थे और उनके वारिस काफी ग़रीब थे। जब महमूद छोटा था और बीमार पड़ता था तो सारा पड़ोस आकर उसकी तबीयत पूछता था। अब जब उसके दिन पूरे होने को आए थे, कोई कभी मिलने नहीं आता।


सच तो यह भी था कि उसके पुराने दोस्त सब मर चुके थे और उसके लड़के उम्रदार हो चुके थे; एक तो पास के गैराज में काम कर रहा था, दूसरा पाकिस्तान में था। बंटवारे के समय वह वहीं था और फिर वापस यहां रिश्तेदारी में नहीं आ सका था।


जो बच्चे दस साल पहले उससे पतंग ले जाते थे वे अब जवान थे और मुश्किल से रोज़ी-रोटी कमाते थे। उनके पास एक बूढ़े आदमी और उसकी याददाश्तों के लिए समय नहीं था।


वे एक तेज़ी से बदलती और होड़ भरी दुनिया में बड़े हुए थे। एक बूढ़ा आदमी और एक बूढ़ा बरगद, दोनों ही, उनके लिए सिर्फ उपेक्षा के पात्र थे।


उन्होंने तय कर लिया था ये दोनों ही हमेशा के लिए इस तरह से जुड़े जरूर थे; पर हल्ला-गुल्ला मचाती, माथे से पसीना बहाती आम आदमी की दुनिया जो उन के आसपास थी, उसका इनसे कोई लेना देना नहीं था।


अब लोग बरगद के पेड़ तले जमा होकर अपनी समस्याओं और अपनी योजनाओं के बारे में बातें नहीं करते थे। सिर्फ गर्मियों में कभी कभी कड़ी धूप से बचने के लिए वहां खड़े हो जाते थे।


पर वह छोटा लड़का था न, महमूद का पोता। महमूद का बेटा पास ही काम करता था। महमूद उस छोटे लड़के को जाड़ों की धूप में खेलते हुए देखता था और जैसे एक तंदुरुस्त पौधा रोज़ कुछ पत्तियां निकाल कर बढ़ता है, वैसे ही अली भी महमूद की आंखों के सामने बढ़ रहा था।


पेड़ों और आदमियों में बहुत कुछ एक जैसा है। हम धीरे-धीरे बढ़ते रहते हैं, अगर हमें कोई चोट न पहुंचाए, भूखा न रखे या काट न डाले।


जवानी में हम अपनी शान से, देखने वालों की आंखों में चमक ले आते हैं, बुढ़ापे में कुछ झुकने लगते हैं, हम टूटती शाखाएं, थके हाथ-पैर धूप में फैलाते हैं और फिर एक लंबी सांस खींचकर अपने आखिरी पत्ते बिखेर देते हैं।


महमूद उस पुराने बरगद के पेड़ सा था, उसके हाथ भी झुर्रियों भरे कुछ टेढ़े मेढ़े हो गए थे, बरगद की जड़ों की तरह।


मित्रों, समय कितनी जल्दी बीत जाता है मालूम ही नहीं चलता. इस तेज गति से भागती दुनिया में अब पुराने लोगों के लिए शायद किसी के पास भी समय नहीं है.


पुराने समय में जो प्रमुख मनोरंजन के साधन हुआ करते थे, आज कहीं अँधेरी कोठरियों में दम तोड़ रहे हैं. आज लोगों के पास इतना समय ही नहीं है के वो उन पुरानी पतंगों को फिर से उड़ा सकें.


अब तो वो खुद ही हवाई जहाजों में बैठ कर इधर से उधर उड़ते हैं तो कागज़ की बनी हुई उन पतंगों की डोर थामे कौन चिलचिलाती धूप में मैदान में जाकर किसी से पेचे लड़ायेगा.


मेरे कुत्ते को घुमा लाओ Mere Kuttey Ko Ghumaa Lao


स्वामी विवेकानंद जी से बहुत से लोग प्रतिदिन मिलने आते थे. कुछ लोग उनसे बातचीत करने आते थे और कुछ लोग अपनी समस्याएं ले कर आते थे. एक दिन एक व्यक्ति उनसे मिलने आया. वो व्यक्ति बहुत दुखी दिख रहा था.


उस व्यक्ति ने स्वामी विवेकानंद जी के चरणों पर गिरकर कहा, "स्वामी जी, मेरे दुखों का अंत ही नहीं हो रहा है. मैं दिन रात मेहनत करता हूँ परन्तु कभी सफल नहीं हो पाता हूँ. कृपया मुझे सही रास्ता दिखाइए."


स्वामी जी ने उस व्यक्ति को उठाया और अपने पास बिठाया. स्वामी जी के पास एक छोटा सा पालतू कुत्ता था. उन्होंने उस व्यक्ति से कहा, "तुम जरा मेरे इस कुत्ते को बाहर घुमा कर ले आयो तब तक मैं कुछ सोचता हूँ."


वो व्यक्ति ख़ुशी ख़ुशी कुत्ते को लेकर बाहर चला गया और उसको बहुत देर तक इधर उधर घुमाता रहा. क्योंकि वो स्वामी विवेकानंद जी का कुत्ता था, उस व्यक्ति ने उस कुत्ते को घुमाने में कोई भी कसर नहीं छोड़ी.


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