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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 31)

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 31)

राजा शर्मा

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 31)

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दो शब्द

संस्कृतियों का मिलन Sanskritiyon Ka Milan

थोड़ा मुझे पढ़के सुनादो Thoda Mujhe Padhke Sunado

सफ़ेद बगुले Safed Bagule

विद्वता की पहचान Vidwata Ki Pehchaan

अमृत की खेती Amrit Ki Kheti

अक्लमंद व्यक्ति कौन है? Akalmand Vyakti Kaun Hai?

बुद्धि रक्षा करती है Buddhi Raksha Karti Hai

राजा भोज और लकड़हारा Raja Bhoj Aur Lakadhara

बाली में लगा मोती Bali Mein Laga Moti

टूटे हुए लोग Tootey Huey Log

बेटा बड़ा हो गया Beta Bada Ho Gaya

छोटी सी सीख Choti Si Seekh

ये फसल काट लो Ye Fasal Kaat Lo

अधिक प्रशंसा हानिकारक Adhik Prashansa Hanikaarak

मानवता का क़र्ज़ Manavta Ka Karz

गुलाम Gulaam

फकीरी का नूर Fakiri Ka Noor

मेरी निजी संपत्ति Meri Niji Sampatti

बच्चे का Bachhe Ka Uphaar उपहार

अबू हफस और दासी Abu Hafas Aur Dasi

वो भी मेरे पुत्र हैं Wo Bhi Mere Putra Hain

सीखते रहो Seekhtey Raho

सिकंदर और राजा फिलिप Sikandar Aur Raja Philip

डॉ. जाकिर हुसैन की दोस्ती Dr. Zakir Hussain Ki Dosti

किसी की परवाह नहीं Kisi Ki Parvaah Nahi



दो शब्द


विश्व के प्रत्येक समाज में एक पीढ़ी द्वारा नयी पीढ़ी को कथाएं कहानियां सुनाने की प्रथा कई युगों से चलती चली आ रही है. प्रारंभिक कथाएं बोलकर ही सुनायी जाती थी क्योंकि उस समय लिखाई छपाई का विकास नहीं हुआ था. जैसे जैसे समय बीतता गया और किताबें छपने लगी, बहुत सी पुरानी कथाओं ने नया जीवन प्राप्त किया.


इस पुस्तक में हम आपके लिए 25 प्रेरणा कथाएं लेकर आये हैं. यह इस श्रंखला की इकत्तीसवीं पुस्तक है. हर कथा में एक ना एक सन्देश है और इन कथाओं में युवा पाठकों, विशेषकर बच्चों, के दिमाग में सुन्दर विचार स्थापित करने की क्षमता है. ये पुस्तक आपको निराश नहीं करेगी क्योंकि ये कहानियां दुनिया के विभिन्न देशों और समाजों से ली गयी हैं.


कहानियां बहुत ही सरल भाषा में प्रस्तुत की गयी हैं. आप अपने बच्चों को ऐसी कहानियां पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करके उनपर बहुत उपकार करेंगे. आइये मिलकर कथाओं की इस परम्परा को आगे बढ़ाएं.


बहुत धन्यवाद


राजा शर्मा


संस्कृतियों का मिलन Sanskritiyon Ka Milan


राहुल सांकृत्यायन को भारतीय यात्रा साहित्य के पितामह के रूप में याद किया जाता है. उनके बचपन का नाम केदारनाथ पण्डे था. उनका जन्म ९ अप्रैल, १८९४, के दिन आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश, के पंदहा गाँव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था.


तीस भाषाओँ के ज्ञाता राहुल, बातें प्रेम की भाषा में किया करते थे.

उनकी इसी प्रेम की भाषा ने उनको पूरी दुनिया में लोकप्रिय बना दिया.


रूसी क्रांति के बाद राहुल सांकृत्यायन ने तय किया कि रूस तो एक बार जाना ही है. तो 1937 में वह पहले सिंगापुर पहुंचे, फिर वहां से जापान, कोरिया, मंचूरिया, मंगोलिया, मध्य एशिया होते हुए रूस गए.


रूस में राहुल को अपनी ही तरह के एक भाषाविद मिले जो उस वक्त रूसी और संस्कृत के शब्दों के आपसी रिश्तों पर काम कर रहे थे.


वहां राहुल सांकृत्यायन ने पालि और संस्कृत भाषा पर कई व्याख्यान दिए, जिसने रातों-रात उन्हें रूस में हीरो बना दिया. इसी बीच उनकी मुलाकात वहीं की एक लाइब्रेरी में काम करने वाली लोला येलेना से हुई और दोनों ने शादी कर ली.


भारत लौटने पर उन भाषाविद से उनकी चिट्ठी-पत्री जारी रही। उन्हीं चिट्ठियों में एक दिन राहुल को पता चला कि रूस में उनका एक पुत्र भी है.


यह जानते ही वह फिर रूस जाने को बेचैन हो उठे, लेकिन इस बीच दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो चुका था.


पिता अगर पुत्र के पास होता तो प्रेम के अलावा किसी भाषा की जरूरत न होती, मगर यहां तो बीच में दुनिया के सबसे भीषण युद्ध की दीवार खड़ी थी। पुत्र से करने वाली बातें वह कागजों से करने लगे।


युद्ध के बाद राहुल जब रूस पहुंचे तो देखा कि पुत्र कागज के उन बंडलों से कहीं ज्यादा बड़ा हो चुका है, जिनमें पिता-पुत्र की बातें भरी हैं। और शक्ल भी बिलकुल राहुल जैसी.


अपने अंश को गले लगाकर वह कई दिनों तक रोते रहे। पितापुत्र का यह मिलन देख वहां मौजूद सभी रूसियों की आंखें भर आईं.


जिस वक्त पूरी दुनिया एक-दूसरे को खत्म करने में लगी थी, यह राहुल सांकृत्यायन ही थे जिन्होंने संस्कृतियों का ऐसा प्रेमिल मिलन कराया था.


मित्रों,


बहुत से ऐसे उद्यमी और महान व्यक्ति हुए हैं जिनके बारे में हमको इतिहास की किताबों में बहुत कम पढ़ने को मिलता है. हो सके तो इस वीडियो को अपने मित्रों के साथ शेयर कीजियेगा.


थोड़ा मुझे पढ़के सुनादो Thoda Mujhe Padhke Sunado


वो पूर्ण रूप से अँधा तो नहीं हुआ था, परन्तु किसी भी प्रकार के चश्मे को लगाकर किसी भी प्रकार के प्रकाश में उसकी आँखों ने पढ़ना बहुत पहले ही छोड़ दिया था.


उसके छोटे से घर में चारों तरफ किताबें ही किताबें भरी पड़ी थी. ऐसा लगता था के उसका छोटा सा घर किसी ज्यादा भरे हुए सूटकेस की तरह था.


कमरे के एक हिस्से में एक अलमारी में बहुत सारी विज्ञान और इतिहास की पत्रिकाएं भरी हुई थी. एक समय में उसको ऐसी पत्रिकाएं पढ़ना बहुत अच्छा लगता था. अब यात्रा करने के लिए ना तो उसका स्वास्थ्य ठीक था और ना ही उसके पास पैसे थे.


फिर उसके पास कागज़ों में प्रिंट की हुई हज़ारों चिट्ठियां और ईमेल थी. उसकी पत्नी उसके साथ मरने से पहले सैंतालीस साल रही थी.वो उसको चिढ़ाया करती थी के उसको पढ़ने से पहले ईमेल कागज़ों पर छापनी पड़ती थी.


वो अपनी पत्नी की कमी महसूस करता था. जब उसकी पत्नी उसकी कम होती आँखों की रौशनी के बारे में उसको चिढ़ाती थी उसको बहुत अच्छा लगता था.


जब उसकी आंखें ठीक थी वो बहुत सी चिट्ठियां और ईमेल लिखा करता था और लोग उनको पढ़ना भी पसंद करते थे. वो चिट्ठियां हाथ से लिखता था और उनको डाक से भेजता था.


उसके दोस्त और रिश्तेदार उसको ईमेल ही भेजा करते थे. वो खुद तो पढता ही था पर वो अपनी दोनों बेटियों को भी पढ़कर सुनाता था. उसकी बेटियां उसको जोर जोर से पढ़कर सुनाने के लिए कहती थी. वो बहुत ही प्रभावशाली आवाज़ में उनको पढ़कर सुनाता था.


बाद में उसने अपने पोते पोतियों को भी पढ़कर सुनाना शुरू कर दिया था. एक के बाद एक वो बहुत सी किताबें पढ़कर अपने पोते पोलियों को सुनाया करता था.


वो अपने पोते पोतियों को हिम मानव, जानवरों, गाड़ियों, और अन्य बहुत सी कहानियां सुनाया करता था. बच्चे हँसते थे तो उसको बहुत अच्छा लगता था.


बच्चों को किताबें पढ़कर सुनाते समय वो जानवरों की आवाजें भी निकाला करता था. वो उनको गीत सुनाता था और अर्थ भी बताता था. उसने अपनी पहली किताब अस्सी वर्ष पहले पढ़ी थी. उस समय वो सिर्फ पांच वर्ष का था.


उसको याद है के उसकी पत्नी की मृत्यु के कुछ हफ्ते पहले के दिनों में वो उसको किताबें पढ़कर सुनाया करता था. उसको याद है के उसकी मृत्यु के ठीक पहले उसने अपनी पत्नी को एक कविता पढ़कर सुनायी थी.


बाद में उसकी मृत्यु के बाद वो जब भी बहुत दुखी होता था उस कविता को कई बार पढता था. बहुत लाभ होता था.


वो अपने विचारों में खोया बैठा था के दरवाजा खुला. प्रकाश की एक किरण अंदर आयी. एक आवाज़ ने कहा, "डैडी, क्या आप उठ गए हैं?"


उसने उन मीठे शब्दों को पहचान लिया. वो सिर्फ आवाज से ही पहचान सकता था के वो कौन थी. "आओ बेटी, अंदर आ जाओ."


वो उस समय हस्पताल में अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था. वो उसके पास ही बैठ गयी. वो सोच रही थी के अच्छा ही था के वो उसके चेहरे पर चिंता के भाव नहीं देख सकते थे. वो उसकी तरफ देखते हुए बोली, "क्या मैं आपको कुछ पढ़कर सुना दूँ?"


"हाँ, हाँ, मुझे कुछ पढ़कर सुना दो."


उसने किताब को मेज से उठाया और उस पेज को खोला जिस पेज को उसने पिछली रात को छोड़ा था. एक हाथ में वो किताब पकड़ी थी और एक हाथ से अपने डैडी के दाहिने हाथ को सहला रही थी. उसने कहानी पढ़ना शुरू कर दिया और दोनों उस कहानी में डूब गए.


उनके सो जाने के बाद वो घर वापिस चली जाने वाली थी. या शायद वो अपनी बेटी के घर ही चली जाने वाली थी ताकि अपनी पोती की बातें सुन सके.


किताब पढ़कर वो अपने डैडी को सुना रही थी, पर वो अपनी पोती के बारे में सोच रही थी जो कहती थी, "नानी, क्या आप मुझे इस किताब में से थोड़ा पढ़कर सुना देंगी?"


बस यही चक्र था जो लगातार घूम रहा था. वो बेटी सोचने लगी जब वो छोटी थी, उसके डैडी उसको पढ़कर सुनाते थे, फिर वो जब बड़ी हो गयी, उसने अपनी बेटी को पढ़कर सुनाना शुरू किया था,


फिर उसकी बेटी की बेटी हुई तो उसने अपनी पोती को पढ़कर सुनाना शुरू किया था और अब वो अपने बूढ़े डैडी और अपनी पोती दोनों को ही पढ़कर सुनाती थी.


मित्रों,


जीवन कब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच जाता है पता ही नहीं चलता है. बचपन से जवानी तक व्यक्ति कैसे अपनी शारीरिक क्षमताओं पर गर्व करता है और सब काम स्वयं करता है और उन लोगों के लिए भी करता है जो खुद नहीं कर सकते.


परन्तु उस समय वो ये कभी नहीं सोचता के जल्दी ही वो समय आने वाला है जब वो कुछ भी नहीं कर सकेगा.


उस समय अन्य लोग ही उसके लिए सब कुछ करेंगे. जीवन भर पढ़कर औरों को सुनाने वाला व्यक्ति अपने जीवन की सांझ में मात्र श्रोता बनकर रह जाता है और इस दुनिया को छोड़ देता है.


सफ़ेद बगुले Safed Bagule


जोनाथन अपने कमरे में कुर्सी पर बैठा समाचारपत्र में शब्द पहेली हल करने का प्रयास कर रहा था. उस हफ्ते की शनिवार की पहेली पिछले हफ्ते की पहेली से कठिन थी. अचानक उसकी पत्नी सैली ने कहा, "सूरज निकल आया है. थोड़ा सा बाहर सैर कर आइये."


वो कुछ कहना ही चाहता था के सैली ने फिर से कहा, "तुम्हारी उम्र में सुबह सुबह बाहर घूमने जाना अच्छा होता है. कल भी मैंने एक पत्रिका में पढ़ा था." सैली हमेशा बूढ़े लोगों के काम आने वाली चीजों के बारे में कुछ ना कुछ पढ़ती ही रहती थी.


जोनाथन सोचने लगा के कभी भी किसी पत्रिका ने ऐसा तो कोई लेख नहीं छापा जो बताये के बूढ़े होने की प्रक्रिया को रोका कैसे जा सके या फिर जवानी की तरफ कैसे लौटा जा सके.


जोनाथन ९० वर्ष छूने वाला था और सैली ८५ की होने वाली थी. जोनाथन को अब जाकर लगने लगा था के वो वास्तव में ही बूढा होने लगा था.


जोनाथन सोचता था के क्या कोई ऐसी जगह हो सकती है जहाँ लोग बहुत ही अच्छे ढंग से बूढ़े होते थे, गोल्फ खेलते थे, दौड़ में भाग लेते थे, जो मन करता था खाते पीते थे, और कोई भी दवाई नहीं लेते थे. लेकिन जोनाथन ने तो ऐसी किसी जगह के बारे में कभी कहीं कुछ नहीं पढ़ा था.


जोनाथन स्वयं भी बहुत सी बीमारियों का शिकार होकर उनमें से निकल भी चुका था. उसने बीस वर्ष से अधिक टेनिस खेला था. उसकी टांगों के जोड़ दुखने लगे थे.


अब सुबह सुबह कभी कभी जुकाम हो जाता था. खाँसना और छींकना तो जैसे उसके जीवन का अभिन्न अग हो गए थे अब. अगर वो एक घंटे से ज्यादा कुर्सी पर बैठ जाता था तो उसकी पीठ दुखने लगती थी.


जोनाथन और सैली अवकाशप्राप्त लोगों की एक कम्युनिटी में अपने सुन्दर परन्तु छोटे से घर में रहते थे. जब वो दोनों वहां रहने आये थे, उन्होंने देखा थे के ज्यादातर लोग झुक कर चलते थे.


उसकी पत्नी सैली ने कहा, "मैं जरा स्टोर तक जा रही हूँ. आप अब क्या कर रहे हैं?"


जोनाथन ने कहा, "मुझे एक कहानी लिखनी चाहिए, परन्तु लिखने का मन नहीं करता." जोनाथन ने सक्रिय जीवन से अवकाश लेने के बाद भी पत्रिकाओं के लिए कहानियां लिखना जारी रखा था.


वो कुछ स्थानीय समाचारपत्रों के लिए भी लिखता था. अब वो महसूस करने लगा था के उसके पास विषयों का आभाव हो गया था. कहानी लिखना उसके लिए कठिन होता जा रहा था.


वास्तव में बुढ़ापे ने उसको दिमागी रूप से थका दिया था और उसने लिखना लगभग छोड़ ही दिया था. जोनाथन कहता के बुढ़ापे में दोस्तों के और रिश्तेदारों के मरने की खबरें आना आम बात हो गयी थी.


वो अभी अपने चाचा के लड़के के बारे में चिंतित था. वो भी ९० की उम्र पार कर चुका था. उसने एक महीने पहले फ़ोन किया था के उसकी तबियत ठीक नहीं थी.


जोनाथन ने कुर्सी से उठते हुए कहा, "शायद मैं थोड़ा घूम फिर ही आऊं. सेहत के लिए अच्छा ही होगा. सभी बूढ़े जल्दी जल्दी मर रहे हैं."



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