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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 27)

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 27)

राजा शर्मा

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 27)

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दो शब्द

बहुमूल्य मुस्कान Bahumoolya Muskan

प्रेम इससे सीखो Prem Isse Seekho

मेरे छोटे बच्चे Mere Chote Bachhe

बेजुबान सहयोग (सत्य कथा) Bejubaan Sahyog

अहमद और रमन (सत्य कथा) Ahmad Aur Raman

पेपर वाला (सत्य कथा) Paper Wala

डर दिमाग में होता है Dar Dimag Mein Hota Hai

शांति का सौंदर्य Shanti Ka Saundarya

रेशमा Reshma

क्या नाम दे? Kya Naam De?

पिताजी कम बोलते थे Pitaji Kam Boltey They

सृजनकार Srijnakaar

आशीर्वाद Aashirwaad

चिट्ठियां Chitthiyaan

पहल तो हो Pahal To Ho

अंधों की दुनिया Andhon Ki Duniya

एक और प्रयास Ek Aur Prayas

प्यास Pyaas

भिखारी Bikhari

दादाजी की कहानी Dadaji Ki Kahani

गलत दृष्टिकोण Galat Drishtikon

वो एक झूठ Wo Ek Jhooth

इतवार की सैर Itwaar Ki Sair

वो दोनों Wo Dono

बहुत धीरे धीरे Bahut Dheere Dheere


दो शब्द


विश्व के प्रत्येक समाज में एक पीढ़ी द्वारा नयी पीढ़ी को कथाएं कहानियां सुनाने की प्रथा कई युगों से चलती चली आ रही है. प्रारंभिक कथाएं बोलकर ही सुनायी जाती थी क्योंकि उस समय लिखाई छपाई का विकास नहीं हुआ था. जैसे जैसे समय बीतता गया और किताबें छपने लगी, बहुत सी पुरानी कथाओं ने नया जीवन प्राप्त किया.


इस पुस्तक में हम आपके लिए 25 प्रेरणा कथाएं लेकर आये हैं. यह इस श्रंखला की सत्ताईसवीं पुस्तक है. हर कथा में एक ना एक सन्देश है और इन कथाओं में युवा पाठकों, विशेषकर बच्चों, के दिमाग में सुन्दर विचार स्थापित करने की क्षमता है. ये पुस्तक आपको निराश नहीं करेगी क्योंकि ये कहानियां दुनिया के विभिन्न देशों और समाजों से ली गयी हैं.


कहानियां बहुत ही सरल भाषा में प्रस्तुत की गयी हैं. आप अपने बच्चों को ऐसी कहानियां पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करके उनपर बहुत उपकार करेंगे. आइये मिलकर कथाओं की इस परम्परा को आगे बढ़ाएं.


बहुत धन्यवाद


राजा शर्मा


बहुमूल्य मुस्कान Bahumoolya Muskan


मोहन उस समय दस वर्ष का था. एक दिन उसके पिता के कारण मोहन के जीवन में रमन आया. रमन ने एक वर्ष में ही मोहन के जीवन पर अमिट छाप छोड़ दी थी. वो अभी भी उसकी स्मृतियाँ साथ लेकर चलता है.


उन दिनों मोहन का परिवार गरीबी से संघर्ष कर रहा था. उसके पिता जी बच्चों को पढ़ाते थे और कुछ पैसे कमाते थे.


एक दिन एक लम्बा तगड़ा लड़का मोहन के पिताजी के पास आया और उसने बताया के वो ग्यारहवीं में पढता था. उसने अपनी गणित की जाँची हुई उत्तर पुस्तिका मोहन के पिता जी को दी.


मोहन के पिताजी ने कहा, "१५० में से सिर्फ ३ अंक गणित में. बोलो अब तुम क्या चाहते हो? मैं क्या करूँ तुम्हारे लिए? मैं तो एक शिक्षक हूँ कोई जादूगर तो नहीं."


उस लड़के ने कहा, "मेरा नाम रमन है. मेरी माँ इस उत्तर पुस्तिका में दिए गए अंकों को देख कर दहाड़ें मार कर रो रही है."


रमन मोहन के पिताजी के पैरों पर गिर पड़ा और बोला, "सर, कृपया मेरी सहायता कीजिये. ऐसा कुछ कर दीजिये के अगली बार मेरी माँ मुस्कुराने लगे."


मोहन के पिताजी को ऐसे बहुत से उद्दंड और कामचोर छात्रों से व्यव्हार करने का अनुभव था.


रमन के पैरों पर गिरने के नाटक से वो प्रभावित नहीं हुए और बोले, "चलो ये सब तो ठीक है परन्तु तुमको बहुत परिश्रम करना होगा. मेरी फीस भी समय पर देनी होगी."


मोहन के पिताजी को उस लड़के को इस तरह फीस के बारे में कहना अच्छा तो नहीं लगा परन्तु बहुत से छात्रों ने उनको भूतकाल में धोखा दिया था और फीस बिना दिए ही पढ़कर चले गए थे.


रमन उस प्रकार का लड़का नहीं था. वो तो सिर्फ अपनी माँ के चेहरे पर फिर से मुस्कान लाना चाहता था.


अगले दिन से वो रोज सुबह चार बजे पढ़ने आने लगा. वो उस कमरे के दरवाजे को ठीक चार बजे खटखटाता था जिस कमरे में मोहन और उसके शिक्षक पिताजी सोते थे.


मोहन के पिताजी ने मोहन से कहा था, "रमन को अपने घर से साइकिल चलाकर यहाँ तक आने में एक घंटा तो लगता ही होगा. वो सुबह तीन बजे ही घर से निकलता होगा."


जब उसके पिताजी रमन को पढ़ाते थे, मोहन रजाई के नीचे से चुपके से बाहर देख लेता था. वो कुछ देर बाद फिर से सो जाता था.


रमन अपनी पढाई के प्रति बहुत ही गंभीर लगता था. वो पूरे एक वर्ष तक पढ़ना चाहता था. मोहन के पिताजी और रमन गणित के सवालों के बारे में खूब चर्चा करते थे.


वो रमन को अपने पाठ को बार बार दोहराने को कहते थे. रमन खूब अभ्यास करता था.


मोहन ने कभी भी उसके पिताजी को किसी छात्र के साथ इतना परिश्रम करते हुए नहीं देखा था. ऐसा लगता था के रमन और मोहन के पिताजी दोनों के सर पर कोई भूत सवार हो गया था.


उसकी लगन को देखकर ही लगता था के वो सब कुछ बहुत अच्छे से सीख रहा था. बारहवीं के इम्तेहान में रमन को गणित में १०० में से १०० अंक मिले.


ये तो एक विलक्षण उपलब्धि थी. परीक्षा का परिणाम आने के बाद वो अपने गुरूजी, मोहन के पिताजी, के पैरों पर दंडवत हो गया. मोहन के पिताजी की आँखों में आंसू थे.


रमन ने मोहन के पिताजी से कहा, "आपने मेरी माँ के चेहरे पर मुस्कान ला दी. मैं आपका ये ऋण कैसे चुकाऊंगा?"


मोहन के पिताजी मुस्कुराये और कहा, "तुमने तो मेरा क़र्ज़ अपने प्रेम और आदर के द्वारा पहले ही चुका दिया है."


मोहन के पिताजी बच्चों को पढ़ाते रहे और अपनी जीविका कमाते रहे. उनकी आर्थिक स्तिथि में कोई सुधार नहीं हुआ था.


एक दिन अचानक ५ वर्षों के बाद एक कार घर के बाहर रुकी. नीले सूट में एक सुन्दर नौजवान उतरा और घर के अंदर आया. वो रमन था. उसको देख कर मोहन के पिताजी की आँखों में ख़ुशी आ गयी.


कुछ देर बातचीत के बाद रमन ने अपने जेब में से एक चेक निकाला और मोहन के पिताजी से कहा, "मैं ज्यादा तो कुछ नहीं कर सकता पर एक छोटा सा स्कूल तो खुलवा ही सकता हूँ.


मेरा अब आयत निर्यात का व्यापार है. गुरूजी ये चेक रख लीजिये और एक छोटा सा स्कूल खोल लीजिये. कृपया ठुकराइयेगा मत."


इससे पहले के मोहन के पिताजी कुछ कह पाते, रमन उठकर बाहर चला गया और उसकी कार घर से दूर होती चली गयी.


मोहन के पिताजी के हाथ में एक लाख रूपए का चेक था जो उस समय के हिसाब से एक घर खरीदने के लिए पर्याप्त था. उनकी आँखों से आंसू गिरने लगे.


मित्रों,


बहुत से लोग गुरुओं से ज्ञान प्राप्त करते हैं और ये समझते हैं के कुछ रूपए फीस देकर उनका क़र्ज़ चुकता हो गया है. नहीं, ऐसा नहीं होता है. वो तो जीवन यापन की राशि होती है.


परन्तु कुछ छात्र ऐसे भी होते हैं जो अपनी सफलता में अपने गुरुओं को भी शामिल कर लेते हैं. आप किस श्रेणी में आते हैं जरा सोचियेगा.


प्रेम इससे सीखो Prem Isse Seekho


जब वो और उसकी पत्नी वृद्धाश्रम से बाहर आ रहे थे, उसके चेहरे पर चिंता और दुःख स्पष्ट देखे जा सकते थे, परन्तु उसकी पत्नी बहुत ही प्रसन्न लग रही थी.


सीढ़ियों से नीचे उतरकर अपनी कार की तरफ जाते हुए वो अपनी जेबें टटोलने लगा.


उसकी पत्नी ने कहा, "क्या ढून्ढ रहे हैं? कुछ खो गया है क्या?"


उसने कहा, "लगता है मैं वृद्धाश्रम में कुछ भूल आया हूँ."


पत्नी ने तंज़ करते हुए कहा, "सीधे सीधे क्यों नहीं कहते के अपने पिताजी की याद आ रही है. उनकी अब चिंता मत करो. यहाँ उनका घर से भी अच्छा ख्याल रखा जाएगा.


हम लोग बीस हज़ार रुपए हर महीने उनकी देखभाल के लिए देंगे. वो यहाँ खुश रहेंगे. चलो अब जल्दी करो. मुझे घर से फिर ब्यूटी पार्लर भी जाना है."


उसने अपनी पत्नी की बात को अनसुना कर दिया और बोला, "मेरा मोबाइल अंदर छूट गया है. मैं लेकर आता हूँ."


पत्नी बोली, "लाओ कार की चाबी मुझे दो. मैं ऐ सी चालू करके कार में बैठती हूँ. कितनी गर्मी है यहाँ तो?"


वो पलटा और दौड़कर फिर से वृद्धाश्रम के अंदर चला गया. उसने पिताजी को उनके कमरे में खोजा पर वो वहाँ नहीं थे. हाँ उसका मोबाइल मेज पर रखा हुआ था. उसने फ़ोन उठाकर अपनी जेब में रख लिया.


पिताजी को खोजने के लिए वो आश्रम के पीछे के बगीचे में पहुँच गया. उसने देखा के उसके बूढ़े पिताजी उनके घरेलू कुत्ते से खेल रहे थे. वो हैरान हुआ क्योंकि वो तो उस कुत्ते को घर पर ही छोड़ कर आये थे. वो यहाँ कैसे आ गया था?


उसके पिताजी घास पर बैठकर अपने पालतू जैकी की गर्दन को हाथ से सहला रहे थे. अपने बेटे को वापिस आया देखकर बूढ़े पिताजी बोले, "जैकी मुझसे बहुत प्यार करता है.


तीन किलोमीटर कार के पीछे पीछे दौड़ता हुआ ही यहाँ तक आ गया. जानवर है बेचारा बोल नहीं सकता पर प्यार की कोई भाषा थोड़ी होती है."


पिताजी और जैकी के बीच के प्रेम को देखकर उसकी आँखों में आंसू आ गए. अचानक उसकी जेब में रखा फ़ोन बजने लगा. उसकी पत्नी का फ़ोन था.


उसने अपनी पत्नी से कहा, "तुम टैक्सी लेकर ब्यूटी पार्लर चली जाओ. मुझे यहाँ अभी दो घंटे लग जाएंगे. कागजी काम पूरा करना है."


उसकी पत्नी फ़ोन पर चिल्लाती रह गयी, "कौन सा कागजी काम! बताओ तो सही! क्या कर रहे हो तुम अंदर?"


उसने तुरंत ही फ़ोन बंद कर दिया और जेब में रख लिया. वो दौड़कर अपने पिताजी के पास गया और घास पर बैठकर उनके गले में बाहें डाल दी, "पिताजी, मुझे माफ़ कर दीजिये. मुझसे तो ये जैकी ही बहुत अच्छा है.


मैं तो नालायक हूँ. चलिए उठिये जल्दी कीजिये घर चलते हैं. पैसे चुकता करने होंगे और सामन भी कार में रखना होगा."


उसके पिताजी ने मुस्कुरा कर अपने बेटे के गाल पर चूम लिया और कहा, "बेटा, कोई बात नहीं. बेटे तो गलतियां करते ही हैं. माँ बाप तो हमेशा ही उनको माफ़ कर देते हैं."


उसके जेब में फ़ोन फिर से बजने लगा परन्तु उसने उसकी तरफ ध्यान ही नहीं दिया. वो वृद्धाश्रम के दफ्तर की तरफ चल दिया. पिताजी और जैकी उसके पीछे चल रहे थे. जैकी ख़ुशी से पूँछ हिला रहा था.


मित्रों,


वृद्ध माता पिता को पुराना सामान समझकर घर से बाहर फेंक देने वाले बेटे या बेटियां वास्तव में इंसान कहलाने के लायक भी नहीं होते.


अरे, माता पिता तो पूजनीय होते हैं.उनको तो भगवान् से भी ऊपर का स्थान देना चाहिए और प्रार्थना करनी चाहिए के उनकी उपस्थिति घर में हमेशा के लिए ही रहे.


मेरे छोटे बच्चे Mere Chote Bachhe


कमरे में पूर्ण अन्धेरा था. वो सोयी हुई थी. अचानक उसको अपने हाथ पर एक स्पर्श महसूस हुआ. वो घबरा कर बोली, "मुझे छोड़ दो मैं नहीं जा सकती तुम्हारे साथ!"


यमदूत की काली आकृति उसको खींचने लगी, "चलो तुमको चलना ही होगा. तुम्हारा समय हो गया है."


"नहीं मैं नहीं जा सकती. मेरे छोटे छोटे बच्चे हैं. मैं उनको छोड़कर कैसे जा सकती हूँ?"


"नियती को कोई नहीं टाल सकता तुमको चलना ही होगा."


यमदूत उसको घसीटने लगा और महाकाल के दरबार में ले आया और बोला, "महाराज, इसको यहाँ लाने में बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ा है. मान ही नहीं रही थी."


महाकाल बोले, "ओह तो तुम आयी हो! तुम्हारी भक्ति की कहानी को तो पूरे देवलोक में लोग जानते हैं. हम तुमको प्रणाम करते हैं सच्ची पुजारिन.


तुमको नमन करते हैं. अच्छा ये तो बताओ के तुम यहाँ क्यों नहीं आना चाहती थी? पृथ्वी पर तुम्हारा समय पूरा हो चुका है देवी!"


वो गिड़गिड़ाई, "महाराज, मेरे छोटे छोटे बच्चे हैं! वो मेरे बिना कैसे जीवित रहेंगे? उनको ममता चाहिए है. एक तो अभी दूध पीता है. वो तो माँ की छाती ही खोजता रहेगा!"


महाकाल ने कहा, "हम तुमको नमस्कार करते हैं महा पुजारिन, परन्तु प्रभु के विधान को तो नहीं बदला जा सकता."


"मुझे थोड़ा समय और दे दीजिये ताकि मैं अपने बच्चों को थोड़ा और बड़ा कर सकूँ."


महाकाल बहुत ही विचलित हो गए. उन्होंने पृथ्वी की तरफ देखा और पाया के वो औरत अपने बच्चों के पास ही सोयी पड़ी है और उसका सबसे छोटा बच्चा उसकी छाती को अपने मुंह से खोज रहा है.


कमरे में खिलौने फैले पड़े हैं. उसके दो बच्चे माँ के शरीर के साथ ही सोये पड़े हैं. उसका बड़ा बेटा अपने मित्रों के साथ घर के बाहर खेल रहा है.


महाकाल ने देखा के उस स्त्री का पति एक दुसरे शहर में एक भट्ठी में लोहा पिघला रहा है और बहुत परिश्रम कर रहा है. उसके पति के दिमाग में उसकी पत्नी और बच्चों के चित्र घूम रहे हैं.


मलहाकाल ने प्रभु से विनती की, "हे प्रभु, इस पुजारिन को कुछ समय और दे दीजिये. इसने सारे जीवन आपकी सच्ची भक्ति की है और बच्चों को खिलाने से पहले हर दिन आपको भोग लगाया है.


ये निष्कलंक, निष्पाप, और ममता से भरी हुई है. इसने अभी जीवन की खुशियां नहीं देखी हैं. थोड़ी दया कीजिये, प्रभु."


प्रभु ने पहली बार विधान तोड़ दिया और उस स्त्री को फिर से जीवन दान दे दिया. उन्होंने यमदूत को आदेश दिया के उस स्त्री को तुरंत वापिस पृथ्वी पर छोड़ आये.


छोटी बच्ची माँ की छाती टटोल रही थी. बीच वाला बेटा, तीन वर्ष का, माँ को हिला हिला कर उसको जगाने का प्रयास कर रहा था.


वो बोला, "माँ उठो ना! छोटी को दूध दे दो और मुझे भी भूख लगी है. भैया भी खेल कर आने वाले होंगे. माँ उठो ना खाना पकाओ ना."


वो उठी और सर पकड़ कर बैठ गयी. उसके सर में कुछ देर हल्का सा दर्द हुआ. वो हाथ मुंह धोकर घर के एक कमरे में मंदिर में चली गयी और जलते हुए दिए में और तेल डाल दिया और प्रभु की प्रार्थना करने लगी.


कुछ देर बाद वो रसोई में छोटी बेटी को छाती से लगाए रोटियां बेल रही थी. चूल्हे पर सब्जी तैयार हो रही थी और उसके दोनों बेटे उसके पास बैठे हुए माँ को रोटियां बेलते हुए देख रहे थे.


मित्रों,


ये ठीक है के हमने प्रभु को नहीं देखा है और हम कोई प्रमाण भी नहीं दे सकते परन्तु हमारी कल्पनाओं और आस्था के सहारे प्रभु की लीला को अपनी कहानियों में तो बयान कर ही सकते हैं. बस यही है हमारा योगदान आप सबके लिए.


बेजुबान सहयोग (सत्य कथा) Bejubaan Sahyog


उषा अपने बच्चों के साथ स्लीपर कोच में कलकत्ता से चेन्नई की यात्रा कर रही थी. उसका बेटा नौ बरस का था और बेटी दो बरस की.


उसी डिब्बे में उनके साथ एक फूटबाल के खिलाडियों की टीम भी यात्रा कर रही थी. उषा ने उन खिलाडियों को देख कर ये अंदाजा लगा लिया के वो बारह खिलाड़ी गूंगे और बहरे थे.


उषा का बेटा सबसे ऊपर की बर्थ पर था जबकि उषा और उसकी बेटी नीचे वाली बर्थ पर थे. उषा के सर में बहुत तीक्ष्ण दर्द हो रहा था और वो सो भी नहीं सक रही थी.


अचानक, मध्यरात्रि के आस पास उसने अनुभव किया के उसका बेटा ऊपर की बर्थ से नीचे की तरफ फिसल रहा था.


वो गिरने ही वाला था के उषा ने हाथ बढ़ा कर उसको पकड़ लिया और सहयोग के लिए चिल्लाई. एक क्षण में ही बहुत से हाथों ने उसके बेटे को पकड़ लिया.


पूरी फूटबाल की टीम ही उस बच्चे को बचाने आ गयी थी. उषा आज भी हैरान होती है के उन्होंने कैसे उसके चिल्लाने की आवाज़ सुन ली थी.


तुरंत ही उनमें से एक ने एक लम्बी डोरी निकाल ली और एक ने उसके सोये हुए बेटे को उठाये रखा.


कुछ लड़के ऊपर बर्थ पर चढ़ गए और उन्होंने उस डोरी को बर्थ के चारों तरफ इस तरह से बाँध दिया के एक प्रकार की रक्षा दीवार बन गयी. उन्होंने एक प्रकार का काम चलाऊ पालना बना दिया था.


डोरी से बनी सुरक्षा दीवारों के बीच उसका बेटा अपनी ऊपर वाली बर्थ पर रात भर बड़े आराम से सोया रहा.


अचानक उन फूटबाल के खिलाडियों को ना जाने कैसे ये आभास हुआ के उषा को सर में दर्द हो रहा था. उन्होंने उसकी छोटी बेटी को उठा लिया और उसके साथ खेलने लगे. उषा चैन से अपनी बर्थ पर सो गयी.


उषा उनकी उदारता देखकर बहुत ही हैरान थी. उसने उन गूंगे बहरे खिलाडियों को ट्रेन से उतरने से पहले धन्यवाद कहा और उनके फूटबाल मैच के लिए शुभकामना दी,


परन्तु वो ये नहीं समझ पायी थी के उनको कैसे आभास हुआ था के उषा को सहायता चाहिए थी और वो ये कैसे जान गए थे के उषा के सर में दर्द हो रहा था.


मित्रों,


प्रभु के खेल भी निराले ही होते हैं. बहुत से लोगों को दिव्यांग बना देता है परन्तु उन लोगों के पास कुछ ऐसी अन्य योग्यताएं आ जाती हैं जिनका कोई वैज्ञानिक उत्तर नहीं दिया जा सकता.


आपने भी देखा होगा के जिनकी आंखें नहीं होती, वैसे बच्चे ज्यादातर बहुत अच्छा गाते हैं. जो गूंगे बहरे होते हैं उनको प्रभु कुछ और क्षमताएं दे देते हैं.


दिव्यांगों का हमेशा आदर किया कीजिये और उनको कभी भी हेय दृष्टि से मत देखा कीजिये. आपको भी तो कोई अदृश्य शक्ति सदैव देख रही है.


अहमद और रमन (सत्य कथा) Ahmad Aur Raman


दुर्घटना के बाद जब रमन की आंखें खुली, उसने स्वयं को हस्पताल के बिस्तर पर पाया. उसकी एक टांग को रस्सी से बाँध कर बिस्तर से ऊपर करके लटका दिया गया था.


उसकी पसलियों में भी बहुत सी चोटें आयी थी और शरीर पर लगभग हर स्थान पर घाव ही घाव थे.


उसको डॉक्टरों से मालूम हुआ के २७ जनवरी १९८२ के दिन वो जिस यात्री रेल से यात्रा कर रहा था वो सामने से आती हुई एक मालगाड़ी से टकरा गयी थी. घने कोहरे के कारण वो भयानक दुर्घटना आगरा के पास हुई थी.


रमन को बस इतना ही याद था के होश खोने से पहले उसने अपनी टांग पर बहुत जोर का दर्द महसूस किया था. उसका शरीर स्थिर हो गया था और वो फंस गया था.


जब रमन के परिवार के लोग उसको देखने के लिए हस्पताल में आये, उसने देखा के उनके साथ एक अजनबी चेहरा भी था. उस दाढ़ी वाले व्यक्ति का नाम अहमद था.


रमन को मालूम चला के उद्धार दल के सदस्यों ने रमन के डिब्बे को छोड़ दिया था क्योंकि वो डिब्बा पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था. उनको लगने लगा था के उस डिब्बे में कोई भी जीवित व्यक्ति नहीं था.


उद्धार दल के सदस्य अगले डिब्बे की तरफ बढ़ने ही वाले थे के अहमद ने अचानक रमन को डिब्बे के अंदर फंसा हुआ देख लिया था.


उसको डिब्बे से बाहर निकालना आसान नहीं था, परन्तु अहमद ने जिद करके सबको कहा के डिब्बे को गैस कटर से काटना होगा.


अहमद ने कई घंटे लगाए और लोहे के एक एक टुकड़े को काटता चला गया और अंत में उसने रमन को खींच कर बाहर निकाल लिया था.


रमन की हालत देखकर सभी लोग कहने लगे थे के उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं थी, परन्तु अहमद को पूरा विश्वास था के रमन बच जाएगा. उसके विश्वास के कारण ही रमन को तुरंत हस्पताल पहुंचा दिया गया.


अहमद उद्धार काम के साथ साथ बीच बीच में हस्पताल आकर रमन के बारे में जानकारी लेता रहा था. उसने कई बार रमन की जिंदगी के लिए दुवायें मांगी थी. अहमद ने ही रमन के परिवार को सूचित किया था.


आज रमन जब अहमद के बारे में सोचता है तो उसके मुंह से सिर्फ प्रशंसा और दुवायें ही निकलती हैं. वो चकित होता है के किस बात ने अहमद को उसकी जान बचाने के लिए प्रेरित किया था.


कुछ समय बाद रमन को मालूम चला के अहमद ने उसकी पत्नी, एक बेटे, और एक बेटी को उसी तरह की रेल दुर्घटना में खो दिया था. वो उनको तो नहीं बचा सका था पर उसने रमन को एक नया जीवन दे दिया था.


आज अहमद इस दुनिया में नहीं है, परन्तु रमन आज भी उस फ़रिश्ते को याद करता है और भगवान् को धन्यवाद देता है.


मित्रों,


किसी का जीवन बचाने से बड़ी बात इस दुनिया में क्या हो सकती है? कई फ़रिश्ते हैं आज भी हमारे बीच जो लोगों की सेवा करना और लोगों के जीवन को बचाने को ही अपने जीवन का उद्देश्य मानते हैं. ऐसे बहादुर और निस्वार्थ लोगों को नमन है.


हमने इस कथा में पात्रों के असली नाम बदल दिए हैं परन्तु कहानी में कुछ भी काल्पनिक नहीं है.


पेपर वाला (सत्य कथा) Paper Wala


वो अभी दस बरस का भी नहीं हुआ था जब उसने अपने माता पिता को खो दिया था. उसके चार भाइयों और दो बहनो को उसके रिश्तेदारों ने गोद ले लिया था और वो हैदराबाद छोड़कर चले गए.


वो आगे पढ़ना चाहता था इसीलिए उसने हैदराबाद छोड़कर जाने से इंकार कर दिया. उसके रिश्तेदार जिद करते रहे पर वो नहीं माना.


उसको परिवार के अन्य सदस्यों ने एक कमरा दे दिया था. वो एक अच्छा छात्र था और पढ़ने में तेज था. अपनी पढाई को आगे जारी रखने के लिए उसको पैसे की जरूरत थी. उसने सुबह सुबह समाचार पत्र बेचने शुरू कर दिए.


वो सुबह सुबह पांच बजे उठ जाता था और काचीगुडा के अपने घर से पैदल चलकर पांच किलोमीटर दूर ट्रुप्स बाज़ार में अखबारें लेने जाता था.


सुबह ६ बजे तक उसको उर्दू के समाचार पत्र 'मंज़िल' की पचास प्रतियां मिल जाती थी. उनका वजन पांच किलो के आस पास होता था.


उसको वो समाचारपत्र तीन किलोमीटर के क्षेत्र में बांटने होते थे. वो मोअज़्ज़म जाही मार्किट से बशीर बाग़ तक जाता था. पेपर बाँटने के बाद वो घर की तरफ दौड़ लगा देता था. वहां से उसका घर तीन किलोमीटर पड़ता था.


घर आकर वो अपना नाश्ता बनाता था और जल्दी जल्दी खाकर काचीगुडा हाई स्कूल की तरफ चल देता था. वो उन दिनों सातवीं कक्षा में पढता था. उसको हफ्ते में स्कूल से तो छुट्टी मिलती थी पर काम से कोई छुट्टी नहीं होती थी.


१९४५ में सर्दी के एक महीने में एक शुक्रवार के दिन जब वो समाचारपत्र बाँट कर घर वापिस आया, उसने देखा के उसके कमरे के दरवाजे के बाहर उसकी उम्र का ही एक लड़का खड़ा था.


उसने अपना नाम अफ़ज़ल बताया और पेपर वाले लड़के को कहा, "मेरे अब्बा तुमसे मिलना चाहते हैं."


उसने पूछा, "क्यों? तुम्हारे अब्बा मुझसे क्यों मिलना चाहते हैं?"


अफ़ज़ल ने कहा, "ये तो तुमको उनसे ही मालूम चलेगा."


सुबह से उस समय तक वो ग्यारह किलोमीटर चल चुका था और उसको बहुत भूख लगी हुई थी. वो जल्दी से अपना नाश्ता बना कर खाना चाहता था.


शुक्रवार के दिन उसके स्कूल की छुट्टी थी. उन दिनों निज़ाम का राज़ था और हर शुक्रवार को छुट्टी होती थी.


उसने सोचा के उस लड़के अफ़ज़ल के अब्बा भी शायद समाचारपत्र खरीदना चाहते थे. वो उस लड़के के साथ चल दिया. अफ़ज़ल का घर नजदीक ही था.


एक लगभग ४० बरस की स्त्री ने दरवाजा खोला. बाद में पेपर वाले लड़के को मालूम चला के वो अफ़ज़ल की माँ नसीम बानो थीं.


उन्होंने पेपर वाले लड़के को बैठने को कहा और उसकी पीठ को थपथपाकर अंदर चली गयीं. कुछ देर बाद वो उसके लिए चाय और नाश्ता ले आयी.


कादिर साहेब, अफ़ज़ल के पिताजी, भी आ गए. वो निज़ाम की रेलवे में इलेक्ट्रिकल फोरमैन थे. अफ़ज़ल उनका इकलौता बेटा था. वो पेपरवाले लड़के के स्कूल में ही पढता था.


अफ़ज़ल की माँ भी आकर बैठ गयी. उन्होंने पेपर वाले लड़के से कहा, "तुम सुबह से शाम तक क्या करते हो?"


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