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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 25)

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 25)

राजा शर्मा

Copyright@2018 राजा शर्मा Raja Sharma

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 25)

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दो शब्द

पहाड़ी पगडण्डी Pahadi Pagdandi

मैं हमेशा साथ हूँ Main Hamesha Saath Hoon

इतनी गहरी दोस्ती Itni Gahri Dosti

रोजर क्रॉफर्ड: हर कोई जीत सकता है Roger Crawford

थोड़ी सी खुशी बांटना Thodi Si Khushi Bantnaa

कहाँ हो मेरे बेटे! Kahan Ho Mere Bete

सकारात्मक सोच Sakaratmak Soch

जीवन चित्र Jeevan Chitra

संक्षिप्त उत्तर Sankshipt Uttar

सिकंदर और ब्युसेफेलस Sikandar Aur Bucephalus

मक्खन का शेर Makkhan Ka Sher

कोर्नेलिया के हीरे Cornelia Ke Heerey

ऐसे मित्र कहाँ! Aise Mitra Kahaan!

सच्ची दवाई Sachhi Dawai

ग्रेस डार्लिंग Grace Darling

राजा अल्फ्रेड और भिखारी Raja Alfred Aur Bhikhari

केक जला दिए Cake Jala Diye

चाय के प्याले Chai Ke Pyale

राजा जॉन और मठाधीश Raja John Mathadheesh

आईने वाली लड़की Aainey Wali Ladki

बत्तखों का रक्षक Batkhon Ka Rakshak

सीखें खाते खाते Seekhe Khaate Khaate

गोथम के बुद्धिमान पुरुष Gotham Ke Buddhiman Purush

कारावास का पौधा Karawaas Ka Paudha

गरीब अमीर Gareeb Ameer





दो शब्द



विश्व के प्रत्येक समाज में एक पीढ़ी द्वारा नयी पीढ़ी को कथाएं कहानियां सुनाने की प्रथा कई युगों से चलती चली आ रही है. प्रारंभिक कथाएं बोलकर ही सुनायी जाती थी क्योंकि उस समय लिखाई छपाई का विकास नहीं हुआ था. जैसे जैसे समय बीतता गया और किताबें छपने लगी, बहुत सी पुरानी कथाओं ने नया जीवन प्राप्त किया.



इस पुस्तक में हम आपके लिए 25 प्रेरणा कथाएं लेकर आये हैं. यह इस श्रंखला की पच्चीसवीं पुस्तक है. हर कथा में एक ना एक सन्देश है और इन कथाओं में युवा पाठकों, विशेषकर बच्चों, के दिमाग में सुन्दर विचार स्थापित करने की क्षमता है. ये पुस्तक आपको निराश नहीं करेगी क्योंकि ये कहानियां दुनिया के विभिन्न देशों और समाजों से ली गयी हैं.



कहानियां बहुत ही सरल भाषा में प्रस्तुत की गयी हैं. आप अपने बच्चों को ऐसी कहानियां पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करके उनपर बहुत उपकार करेंगे. आइये मिलकर कथाओं की इस परम्परा को आगे बढ़ाएं.



बहुत धन्यवाद



राजा शर्मा



पहाड़ी पगडण्डी Pahadi Pagdandi



ये कहानी एक अंधे लड़के की है जो सोचता था के वो किसी काम का नहीं था. वो अपनी छोटी सी दुनिया में रहकर अपने पिताजी की बकरियां चराया करता था.



१८५७ में एक दिन उस लड़के के पिता और बड़ा भाई तात्या टोपे की फ़ौज मैं भर्ती हो गए. तात्या टोपे अँगरेज़ फ़ौज के विरुद्ध लड़ रहे थे.



लड़का बहुत ही निराश हो गया. एक दिन भाग्यवश उसका सामना तात्या टोपे से हो गया. तात्या टोपे भारतीय सिपाहियों के नेता थे.



एक चरवाहे के रूप में वो लड़का तात्या टोपे और उनकी फ़ौज को पहाड़ पर रास्ता दिखते हुए सुरक्षित जगह ले गया. इस घटना ने युद्ध की दिशा ही मोड़ दी.



१८५७ की लड़ाई झाँसी के पास हुई थी. झाँसी उत्तर प्रदेश का एक शहर है. हम कहानी यहाँ से शुरू करते हैं:



अपनी पगड़ी अपनी आँखों पर रखे, सुखराम लोधी एक चट्टान का सहारा लेकर बैठा था. सूरज की किरणे उसके पैरों को गरम कर रही थी.



उसके पैरों को ये जानकारी होती थी के वो कहाँ था. वो पत्थरों और घास से जगह का अंदाजा लगा लेता था. जब एक चिड़िया चहचायी, वो समझ गया के चिड़िया क्या कह रही थी.



क्योंकि वो अँधा था, अपने आस पास की आवाजें सुनकर ही वो आस पास के बारे में जानकारी लेता था. राजबीर उसका बड़ा भाई था और शिवप्रिया चौहान उसके दादाजी थे.



उसके बड़े भाई और दादाजी ये जानते थे के वो चिड़ियों और जानवरों की बातें समझ लेता था. वो दोनों सुखराम का कभी उपहास नहीं उड़ाते थे.



चौदह बरस के सुखराम को देखकर लोगों को बहुत दुःख होता था. लेकिन सुखराम सोचता था के यदि वो लोग देख सकते के दुनिया कितनी खूबसूरत है तो वो लोग उससे ईर्ष्या करते.



लोगों को तो घास की हलचल की भी जानकारी नहीं थी. लोग चीजों को छू कर महसूस करने की कला नहीं जानते थे. उनको अलग अलग सुगंधों के बारे में नहीं मालूम था.



अपने पिताजी की बकरियां चराते समय वो अपनी बकरियों को उनके खुर की आवाज और उनकी गंध से पहचान लेता था. वो जानता था के बकरियां चराना उसके लिए कठिन काम नहीं था.



सुखराम की आवाज़ सुनकर उसकी बकरियां उसके पास आ जाती थी. जब वो बांसुरी बजाता था, बकरियां उसके पीछे पीछे चलने लगती थी.



उस दिन जब सूरज की गर्मी कम हो गयी, सुखराम समझ गया के साँझ हो गयी थी और वापिस जाने का समय हो गया था. उसने अपनी बांसुरी बजानी शुरू कर दी.



ऊपर पहाड़ी पर हलचल होने लगी और वो समझ गया के बकरियों तक उसका सन्देश पहुँच गया था.



बकरियां अपने सर उठा कर सुखराम की तरफ देखने लगी थी. उसने फिर से बांसुरी बजाई. कुछ ही समय में उसकी बकरियों ने उसको चारों तरफ से घेर लिया.



अब उन बकरियों को पहाड़ से नीचे उनके बाड़े में ले जाने का समय हो गया था. कल सुबह वो उनको फिर पहाड़ पर ले आएगा. वो अपने जीवन से बहुत खुश था.



उस दिन जब वो पहाड़ पर था, झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी थी. शक्तिशाली तात्या टोपे की फ़ौज ने भी रानी का साथ देने का निर्णय किया था.



उसके पिता और उसके बड़े भाई राजबीर अपने घोड़ों की काठियाँ ठीक कर रहे थे. दोनों ने सुखराम को चूमा और विदा ले ली. दोनों ने अपनी बंदूकें अपने हाथों में उठाई हुई थी.



जब उसके भाई और पिताजी के घोड़ों की टापों की आवाजें मंद होने लगी, उसने महसूस किया के उसकी माँ उसके पास आकर खड़ी हो गई थी. माँ ने अपनी बांह उसके कंधे पर रख दी थी. सुखराम ने कहा, "अम्मा, अब आप क्या करेंगी?"



उसकी माँ ने कहा, "हम दोनों तेरे दादाजी के पास जा रहे हैं."



सुखराम ने कहा, "पर माँ वहां तो अब अँधेरा होगा. मैं उनके खेतों को पहचानता नहीं. मैं अँधेरे में अपनी बकरियों को उस अजनबी जगह पर कैसे ले जाऊँगा." उस दिन उसको एहसास हुआ के अँधा होने के कारण वो कितना असहाय था.



अगली सुबह घोड़ागाड़ी तैयार हो गयी. सुखराम, उसकी माँ, उनके मवेशी, बकरियां सभी पंद्रह किलोमीटर की यात्रा के लिए तैयार थे.



माँ ने सुखराम को आवाज़ लगाकर बुलाया. सुखराम ने कंधे पर एक बोरा बाँध लिया था. उसने कहा, "मैं भाई की दूसरी बन्दूक भी ले चल रहा हूँ."



उसकी माँ थोड़ी हैरान हुई. सुखराम ने कहा, "लोग कहते हैं के मेरी आंखें साफ़ और काली हैं. यदि कुछ हुआ तो तुम बन्दूक मेरे हाथ में देकर मुझे उनके सामने खड़ा कर देना. कोई भी नहीं कह सकेगा के मैं अँधा हूँ."



घोडा गाडी में माँ के साथ बैठकर सुखराम ने कहा, "मैं कुछ भी नहीं हूँ. मैं एक नयी जगह जा रहा हूँ और मैं कुछ भी नहीं जानता के मैं कहाँ जा रहा हूँ." घोडा गाड़ी धीरे धीरे चलने लगी. सभी जानवर भी साथ साथ चलने लगे.



सुखराम ने कहा, "माँ तुम क्या क्या देख रही हो? क्या तुम उन पहाड़ों को देख सकती हो जहाँ मैं बकरियां चराता हूँ?"



जब वो दादाजी के घर पहुंचे तो पता चला के दादाजी और सभी लड़के जा चुके थे. सुखराम ही अकेला लड़का था वहाँ. प्रतीक्षा के सिवा कुछ करने के लिए नहीं था.



दिन बीतने लगे. कोई भी समाचार नहीं आया. सुखराम ने दादाजी के खेतों में इधर उधर घूम कर रास्ते पता लगाना शुरू कर दिया था.



एक दिन कुछ थके हुए सिपाही अपने घोड़ों पर उधर से जा रहे थे. सुखराम ध्यान लगाकर सुनने लगा. उसने उन सिपाहियों से पूछा, "क्या आपने मेरे पिता और मेरे भाई को देखा है?"



एक सिपाही ने कहा, "तुम कौन हो?"



"मैं सुखराम लोधी हूँ. मैं अँधा हूँ. मेरे पिता जी तात्या टोपे की फ़ौज में हैं," सुखराम ने उनको बताया.



उस सिपाही ने कहा, "हम भी तात्या टोपे की फ़ौज में भर्ती होने जा रहे हैं. हम तुम्हारे पिता को बता देंगे के तुम हमको मिले थे."



कुछ देर बाद सुखराम को और घोड़ों की आवाजें सुनायी दी. वो पहचान गया के वो घोड़े उसके अपने लोगों के नहीं थे. वो घोड़े ज्यादा बड़े और वजनी थे.



उसको धातु के खड़कने की आवाजें भी आयी. वो समझ गया के वो अँगरेज़ सिपाही थे और वो थके हुए भारतीय फौजियों का पीछा कर रहे थे.



उनमे से एक ने सुखराम से पूछा, "क्या तुमने कुछ सिपाहियों को यहां से जाते देखा था?" उसकी आवाज से सुखराम समझ गया के वो उन अँगरेज़ फौजियों का सेनापति था. उसकी आवाज कड़ी और अधिकारपूर्ण थी.



सुखराम ने कहा, "मैं तो दिन भर यहीं रहा हूँ पर मैंने किसी को भी नहीं देखा."



उस अँगरेज़ ने कहा, "इससे तुमको कुछ लाभ नहीं होगा. लेकिन वो लोग इसी रास्ते से गए हैं. वो ज्यादा दूर नहीं जा सकते क्योंकि उनके घोड़े थके हुए थे."



सुखराम ने भी सोचा के ठीक ही कहा था उसने के उनके घोड़े थके हुए थे. वो हैरान था के उन अँगरेज़ सिपाहियों ने पहले गए घोड़ों के खुरों के निशान नहीं देखे थे. वो अँगरेज़ सिपाही चले गए.



जब वो सुखराम के पास से गुज़र रहे थे, सुखराम ने हिसाब लगाया के वो तीस घुड़सवार थे. वो अपने कान लगा कर और आवाजें सुनने लगा. वो जानता था के और भी घुड़सवार उधर आएंगे.



एक गोली चलने की आवाज़ आयी. उसके बाद कई और गोलियां चली. वो पहचान गया के वो उसके अपने ही लोग थे क्योंकि अँगरेज़ उस तरह से गोलियां नहीं चलाते थे.



अँगरेज़ छोटे छोटे समूहों में नहीं लड़ते थे. अँगरेज़ जल्दी जल्दी गोलियां चलाते थे और बड़ी संख्या में होते थे. उसको अपने पिता और अपने भाई राजबीर की चिंता होने लगी.



वो धीरे धीरे घर की तरफ चलने लगा. उसकी माँ ने कहा, "क्या तुमने अँगरेज़ सिपाही देखे?"



उसने कहा, "हाँ माँ. उन्होंने तो मुझसे बात भी की थी. वो कुछ भारतीय सिपाहियों का पीछा कर रहे थे. वो भारतीय फौजी तात्या टोपे की फ़ौज में भर्ती होने को जा रहे थे. पिताजी और राजबीर भी थे.



माँ ने कहा, "उनका कोई समाचार आ जाता!"



"हां माँ, बिना किसी समाचार जीना कितना कठिन होता है. पुरुषों का युद्ध में होना भी आसान नहीं है. आज मुझको शर्म महसूस हुई.



मैंने अंग्रेज़ों को नहीं बताया के हमारे सिपाही किधर गए थे.

उनको तो पता ही नहीं चला के मैं अंधा हूँ. ओह माँ, क्या मैं कुछ भी नहीं कर सकता?"



उस रात सुखराम को नींद ही नहीं आयी. ऐसा प्रतीत होता था जैसे बिना सोये, दुःख उठाकर, और उनके बारे में सोच सोचकर वो औरों को मदद कर सकता था. उसने अपने दिमाग में ही एक युद्ध की रचना कर ली.



उसने सपने में फौजियों को लड़ते हुए देखा और गोलियां चलती हुई देखी. वो घबरा कर उठ गया और उसने अपनी माँ को पुकारा, "अम्मा! मैंने सपने में भाई को घोड़े पर बैठे देखा. वो बहुत तेज़ घोडा चला रहा था. माँ, मेरी बन्दूक दो! बन्दूक दो!"



माँ ने बन्दूक सुखराम के हाथों में थमा दी. उसने बन्दूक में एक गोली डाली. वो खोजते खोजते दरवाजे तक गया और दरवाजा खोल दिया.



एक घोडा बहुत ही तेज़ गति से आ गया था. सुखराम ने कहा, "अपनी लालटेन जलाओ और मेरे पास खड़े हो जाओ."



वो दरवाजे के बीचों बीच खड़ा हो गया. बन्दूक उसके हाथ में थी. वो चिल्लाया, "रुक जाओ नहीं तो मैं गोली चला दूंगा. घोडा तो राजबीर का है पर शायद राजबीर नहीं आया."



उसका भाई राजबीर ही था. उसने कहा, "सुखराम, सुखराम! तुम बन्दूक हाथों में लेकर क्या कर रहे हो?"



माँ ने आते ही पूछा, "क्या हुआ राजबीर?"



"अम्मा, मैं अभी बयान नहीं कर सकता. मैं सुखराम को लेने आया हूँ. तात्या टोपे को सुखराम की जरूरत है."



सुखराम ने खुश होते हुए कहा, "हाँ, हाँ, मैं तैयार हूँ. बताओ मुझे क्या करना होगा?"



राजबीर ने कहा, "इधर आओ मेरे साथ चलो. मैं रास्ते में तुमको बताता हूँ."



सुखराम घोड़े के पास गया और अपने भाई की टांग को छू कर देखा. भाई ने उसको उठा कर घोड़े पर बिठा लिया. "जोर से पकड़ना, सुखराम. हम चलने लगे हैं."



जैसे ही सुखराम ने भाई के पीछे बैठकर उसकी कमर में हाथ लपेटा, घोडा सरपट दौड़ पड़ा. अचानक बरसात होने लगी. वो नहीं जानता था के वो कहाँ जा रहे थे. सुखराम सोचने लगा के वो तात्या टोपे को कैसे सहयोग कर पायेगा.



रास्ता और भी खराब होता गया. रास्ते में बहुत पत्थर थे. घोड़े के लिए दौड़ना मुश्किल हो गया. सुखराम ने गहरी सांस ली और गंध से मालुम किया के वो पहाड़ों के पास पहुँच चुके थे. ये उसके अपने पहाड़ की गंध थी.



राजबीर ने जोर से चिल्लाकर अपने साथियों से कहा, "मैं वापिस आ गया हूँ!"



उसके पिता ने कहा, "सुखराम भी आया है?"



राजबीर ने कहा, "जी हाँ मेरे पीछे बैठा है. अब आप इसको बताइये जो भी बताना है."



तात्या टोपे ने सुखराम को देखकर कहा, "सुनो, सुखराम. हम लोगों की संख्या सिर्फ एक सौ है. अंग्रेज़ों की फ़ौज बहुत बड़ी है. अंग्रेज़ों को नहीं मालूम के हम यहाँ पर हैं. हम अंग्रेज़ों को फ़साना चाहते हैं.



सुखराम ने कहा, "मैं समझ गया आप उनपर दोनों तरफ से आक्रमण करना चाहते हैं."



तात्या टोपे ने कहा, "हाँ, परन्तु कुछ गलती हो गयी है. अंग्रेज़ों की एक टुकड़ी पहाड़ की चोटी पर पहुँच चुकी है. वो दूसरे रस्ते से ऊपर पहुँच गए.



नदी के पार जाने वाले रस्ते पर हमारा नियंत्रण है, परन्तु ऊपर से अँगरेज़ हमको दबा सकते हैं. हम आज रात उनपर आक्रमण करेंगे परन्तु सिर्फ एक ही रास्ता है इस तरफ से. वो रास्ता बहुत ही पतला है, सिर्फ एक पगडण्डी.



इतनी अंधेरी रात में उस पगडण्डी पर चलकर हम कुछ भी नहीं कर सकते. तुम्हारे भाई ने बताया के तुम हमको पहाड़ की चोटी तक पहुंचा सकते हो."



"मैं, तात्या टोपे की फ़ौज का नेतृत्व करूंगा?"



उसके भाई ने कहा, "हाँ, हाँ, सुखराम. तुमको रास्ता मालूम है."



सुखराम ने कहा, "जरूर, मुझे सब रास्ते मालूम हैं." सुखराम ने अपने जीवन के सभी वर्ष उन पहाड़ों पर बकरियां चराते हुए बिताये थे.



सुखराम उन लोगों का नेतृत्व करने लगा. वो एक पगडण्डी थी जिसपर वो अपनी बकरियों के साथ चला करता था.



सब फौजी उसके पीछे पीछे चलने लगे. सुखराम के पैर हर पत्थर, हर पौधे और पेड़ की जड़, और हर मोड़ को पहचानते थे. वो पहाड़ों की गंध को पहचानता था.



उसके पिताजी ने कहा, "ये तो बकरियों के चलने की पगडण्डी है. मुझे तो नहीं मालूम था के तुम यहाँ तक भी आते थे. मैं तुमको कभी भी इधर नहीं आने देता अगर मुझे मालूम होता. इतनी खतरनाक चढ़ाई है अगर फिसल कर नीचे गिर जाते तो...."



सुखराम ने कहा, "मैं नहीं फ़िसलूंगा पिताजी, ये मेरी पगडण्डी है."



इतना अँधेरा था के किसी को कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था. सब के पास आंखें थी परन्तु सुखराम अँधा था और वो ही उस अँधेरे में देख रहा था. वो सही रास्ते पर चलता जा रहा था. उसने कहा, "पिताजी, हम बस पहुँचने ही वाले हैं."



उसने पास की एक चट्टान को हाथों से छू का देखा और आगे बढ़ गया. कुछ ही देर में वो और उसके पिताजी ऊपर पहुँच गए.



सभी सिपाही भी ऊपर आ गए. सबकी साँस फूल चुकी थी क्योंकि चढ़ाई बहुत ही कठिन थी. तात्या टोपे ने अपने फौजियों को चारों तरफ फ़ैल जाने का आदेश दिया.



सुखराम के पिताजी ने धीरे से धकेल कर सुखराम को एक बड़े से पत्थर के पीछे छुपा दिया और कहा, "तुम यहीं पर बैठे रहो. हम तुमको लेने वापिस आएंगे."



वो लोग चल दिए और सुखराम वहीँ पर उनकी प्रतीक्षा करने लगा. तात्या टोपे और उनके फौजी जमीन पर रेंगते रेंगते सोये हुए अँगरेज़ शत्रुओं के कैंप की तरफ बढ़ने लगे.



अचानक भयंकर गोलीबारी शुरू हो गयी. घायलों के चीखने की आवाजें आने लगी. गोलियां लगातार चल रही थी. कुछ देर में तात्या टोपे के फौजी ख़ुशी से चिल्लाये, "वो लोग भाग रहे हैं!"



अँगरेज़ फौजी भाग गए थे. उसके पिताजी की आवाज़ आयी, "सुखराम! सुखराम! तुम कहाँ हो?"



सुखराम उनके सामने आ गया और उन्होंने उसका हाथ पकड़ लिया. वो हाथ उसके पिताजी का नहीं तात्या टोपे का था. "मैं तुमको धन्यवाद कहना चाहता हूँ.




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