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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 24)

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 24)

राजा शर्मा

Copyright@2018 राजा शर्मा Raja Sharma

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 24)

Copyright

दो शब्द

सुखी परिवार Sukhi Parivaar

सुखी कारावास Sukhi Karawaas

किसी की मदद Kisi Ki Madad

सच्चे दोस्त Sachhe Dost

एक चुन लो Ek Chun Lo

प्यार कठिनाइयों में बढ़ता है Pyar Kathinaiyon Mein Badhta Hai

एक बहुमूल्य बात Ek Bahumulya Baat

एक और मौका Ek Aur Mauka

आखरी प्यार Akhri Pyar

मेरे भावी प्रेमी के लिए Mere Bhavi Premi Ke Liye

क्या बोलूं मेरे बेटे Kya Bolun Mere Betey

प्यार के समय का इंतज़ार Pyar Ke Samay Ka Intezaar

भ्रम का पर्दा Bhram Ka Parda

बेटी चली Beti Chali

दादी का पहला प्रेम Dadi Ka Pehla Prem

दादाजी ने बचाया Dadaji Ne Bachaaya

अठारह बरस बाद Atharah Baras Baad

प्यारी बातें Pyari Batein

नाचने वाली Nachne Wali

वो दिन ये दिन Wo Din Ye Din

माचिस वाली लड़की Machis Wali Ladki

पुरुष के बंधन बिना Purush Ke Bandhan Bina

पिता की चिट्ठी Pita Ki Chitthi

मुर्दाघर (शवागार) Murdaghar

फूलों का गुलदस्ता Phoolon Ka Guldasta



दो शब्द



विश्व के प्रत्येक समाज में एक पीढ़ी द्वारा नयी पीढ़ी को कथाएं कहानियां सुनाने की प्रथा कई युगों से चलती चली आ रही है. प्रारंभिक कथाएं बोलकर ही सुनायी जाती थी क्योंकि उस समय लिखाई छपाई का विकास नहीं हुआ था. जैसे जैसे समय बीतता गया और किताबें छपने लगी, बहुत सी पुरानी कथाओं ने नया जीवन प्राप्त किया.



इस पुस्तक में हम आपके लिए 25 प्रेरणा कथाएं लेकर आये हैं. यह इस श्रंखला की चौबीसवीं पुस्तक है. हर कथा में एक ना एक सन्देश है और इन कथाओं में युवा पाठकों, विशेषकर बच्चों, के दिमाग में सुन्दर विचार स्थापित करने की क्षमता है. ये पुस्तक आपको निराश नहीं करेगी क्योंकि ये कहानियां दुनिया के विभिन्न देशों और समाजों से ली गयी हैं.



कहानियां बहुत ही सरल भाषा में प्रस्तुत की गयी हैं. आप अपने बच्चों को ऐसी कहानियां पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करके उनपर बहुत उपकार करेंगे. आइये मिलकर कथाओं की इस परम्परा को आगे बढ़ाएं.



बहुत धन्यवाद



राजा शर्मा



सुखी परिवार Sukhi Parivaar



साधना आज बहुत ही प्रसन्न दिख रही है. आज उसका जन्मदिन है और हर जन्मदिन की तरह उसको बहुत से लोगों से उपहार प्राप्त होंगे. एक दिन के लिए तो विशेष हो ही जाता है. उसको ये सब अच्छा लगता है.



वो सुबह सुबह उठी और ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी होकर अपने बाल ठीक किये. उसके पिताजी ने पीछे से आकर उसको पीछे से अपनी बाहों में लपेट लिया और उसके सर को चूम लिया. "जन्मदिन मुबारक हो मेरी बेटी. भगवान् तुमको बहुत लम्बी उम्र दे."



साधना मुड़ी और मुस्कुरा कर बोली,"धन्यवाद, डैडी." उसने अपने पिता का गाल चूम लिया. बाप ने बेटी के सर पर हाथ रखकर फिर से आशीर्वाद दिया.



राजन, साधना के पिता, ने उसको पूछा, "आज हमारी बेटी को अपने जन्मदिन पर क्या उपहार चाहिए है?"



साधना ने मुस्कुरा कर कहा, "कुछ भी नहीं चाहिए, डैडी. बहुत से लोग ऐसे भी हैं जिनके पास जन्मदिन की मुबारकबाद देने के लिए भी समय नहीं है." साधना ने अपनी माँ की तरफ देखा. उसकी माँ अपने कामो में व्यस्त थी.



मीरा, साधना की माँ, मुड़ी और चेहरे पर एक दुखद मुस्कान लाकर बोली, "जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक मेरी बेटी."



साधना ने अपनी माँ की तरफ ध्यान नहीं दिया और जाने को हुई, पर उसके पिता ने संकेत किया, "साधना, तुम्हारी माँ ने तुमको जन्मदिन की बधाई दी है. वो तुम्हारी माँ है. उनको धन्यवाद कहना तुम्हारा धर्म है." राजन की आवाज में गुस्सा झलक रहा था.



मीरा ने राजन से कहा, "साधना को आज कुछ मत कहिये. आज खास दिन है."



साधना ने गुस्से में अपनी माँ को कहा, "आप चुप रहिये माँ. आप ही इस सबके लिए जिम्मेदार हैं. हर वर्ष आप मेरा जन्मदिन खराब कर देती हैं. मेरे सभी दोस्त अपना जन्मदिन मनाते हैं पर मेरी ये माँ, तथाकथित सौतेली माँ, मुझे कभी भी खुश नहीं देखना चाहती है."



इससे पहले के साधना कुछ और कह पाती उसके गाल पर एक जोरदार थप्पड़ पड़ा. राजन की आंखें गुस्से से लाल हो गयी थी. साधना ने भी गुस्से से अपनी माँ की तरफ देखा और वहां से चली गयी. मीरा ने राजन की तरफ देखा और उसके कंधे पर हाथ रख दिया.



मीरा ने कहा, "आपने उसको थप्पड़ नहीं मारना चाहिए था. वो अभी बहुत छोटी है. आप समझते क्यों नहीं?"



राजन ने उसी गुस्से में कहा, "१४ वर्ष की हो गयी है और उसको अब तो मालूम होना चाहिए के क्या ठीक है क्या गलत है."



मीरा ने कहा, "आज आप चुप रहिये. आज उसका जन्मदिन है और आज आपका फ़र्ज़ है के आपकी बेटी खुश रहे. मैं नहीं चाहती के मेरे कारण से हमारी बेटी मुस्कुराना छोड़ दे."



राजन उठा और दूसरे कमरे में गया जहां उसकी बेटी सुबक रही थी. उसने बेटी के सर पर अपना हाथ रख दिया और उसको पुचकारने लगा.



राजन ने साधना से कहा, "क्या मेरी बेटी मुझसे बात नहीं करेगी? तो फिर मैं पार्टी किसके साथ मनाऊंगा?"



राजन के चेहरे पर मुस्कान देखकर साधना ने रोना छोड़ दिया और अपने पिता के गले में बाहें डाल दी. "थैंक यू, डैडी. हम आज खूब मजा करेंगे."



राजन ने कहा, "चलो अब जल्दी करो और तैयार हो जाओ. आज हम तीनो पार्टी करेंगे."



तीनो सुनते ही साधना समझ गयी के राजन उसकी माँ को भी साथ ले जाना चाहते थे. उसकी मुस्कान गायब हो गयी. फिर भी वो तैयार होने चली गयी.



थोड़ी देर बाद एक बहुत बड़ी कार उनके दरवाजे पर आकर रुकी. राजन, मीरा, और साधना उस कार में बैठ गए. कार तालाब के किनारे के पार्क की तरफ चल दी.



अचानक कार के सामने एक ट्रक आ गया. मीरा ने उस ट्रक को देख लिया. मीरा ने तुरंत राजन और साधना को जोर से नीचे झुका दिया और वो दो सीटों के बीच फर्श पर पहुँच गए. बहुत भयंकर दुर्घटना हुई.



मीरा को इमरजेंसी में भर्ती कर दिया गया. राजन और साधना बिलकुल सुरक्षित थे. कार का छत नीचे आ गया था और सीधा मीरा के सर से टकराया था. साधना और राजन को बिलकुल भी चोट नहीं आयी थी.



राजन की आँखों में आंसू देखकर साधना ने उसके कन्धों पर अपने हाथ रख दिए."डैडी, आप रोईए मत. माँ ठीक हो जाएंगी." साधना की आँखों से भी आंसू गिरने लगे.



वो नहीं जानती थी के वो क्यों रो रही थी. उस दिन से पहले उसने कभी भी मीरा को माँ समझकर आदर नहीं किया था.



राजन भी समझ गया के उसकी बेटी बहुत ही दुखी थी. राजन ने कहा, "साधना बेटी, तुमने कभी भी मीरा को अपनी माँ नहीं माना और उसको कभी भी प्यार नहीं किया. आज मैं तुमको बताता हूँ. मीरा तुम्हारी माँ अम्बिका की बहन है.



तुम्हारी माँ के मरने के बाद मीरा को बहुत दुःख हुआ. उसको बहुत अच्छे अच्छे पति मिल जाते पर वो तुमसे बहुत प्रेम करती थी और उस समय तुम सिर्फ तीन साल की थी.



तुम्हारी देखभाल करने के लिए मीरा ने मुझसे शादी की. वो ऑपरेशन करवा कर मेरी पत्नी बनने को तैयार हुई थी ताकि कभी भी माँ ना बन सके.



मीरा ने सिर्फ तुमको ही अपनी बेटी माना और अपने बच्चों को जनम देने से इंकार कर दिया. तुमने मीरा को बहुत गलत समझा बेटी."



साधना के हाथ पाँव कांपने लगे. उसने कितना बुरा किया था. उसने हमेशा ही मीरा को बुरी औरत माना था जबकि साधना की ख़ुशी के लिए मीरा ने माँ बनने से भी इंकार कर दिया था.



मीरा के सर का ऑपरेशन हुआ और आठ घंटे के बाद उसने आंखें खोली. उसने साधना को देख कर कहा, "तुम ठीक हो बेटी?"



साधना ने झुक कर मीरा के गाल पर चूम लिया और कहा, "हाँ माँ मैं बिलकुल ठीक हूँ. बस आप जल्दी से ठीक हो जाइये. आज के बाद मेरी जिंदगी का हर दिन ही आपके साथ खास होने वाला है."



मीरा ने मुस्कुरा कर कहा, "तुम मेरे साथ होगी तो हर दिन ही विशेष होगा."



राजन भी खिड़की में से माँ बेटी को कमरे में देख रहा था. उसके चेहरे पर भी एक बहुत ही संतोषजनक मुस्कान थी.



मित्रों,



ये ठीक है के जनम देने वाली माँ सबसे ऊपर होती है परन्तु हमको ये नहीं मान लेना चाहिए के हर सौतेली माँ बुरी ही होती है. हमको लोगों के दिल की बात को समझ लेना चाहिए और फिर कोई भी निर्णय लेना चाहिए. हर औरत बुरी तो नहीं होती है.



सुखी कारावास Sukhi Karawaas





सुनिधि कमरे में अकेली थी. घर में एक नौकरानी थी जो रसोई में काम कर रही थी. सुनिधि बिस्तर पर ही लेटी थी. वो बीच बीच में एक पेपर भी पढ़ रही थी.



उसके बच्चे और पति घर पर नहीं थे. बच्चे स्कूल में थे और पति अपने दफ्तर में थे. वो एक बहुत बड़े व्यापारी थे. बाहर बगीचे में माली पौधों की सिचाई कर रहा था.



अचानक उसके कान में एक आवाज आयी, "अकेली हो क्या!" वो चौंक कर उठ बैठी. उसने कमरे में देखा तो और कोई भी नहीं था. उसने सोचा के ये उसका भ्रम ही था.



वो उठकर कुर्सी पर बैठ गयी. काम तो कोई था ही नहीं. टेलीविज़न भी कितने घंटे देखे? फ़ोन पर गप्पें मारते हुए भी कई घंटे बीत जाते थे. काम तो बस दो ही थे: खाना पीना और सोना. सब घरेलु काम नौकरानी ही कर देती थी. रसोइया खाना बना देता था.



उसने सोचा, "पति का अच्छा व्यापार है, बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ते हैं, घर में चार नौकर और एक नौकरानी है, किसी चीज़ की कमी नहीं है, पर जीवन में खालीपन क्यों है?"



अचानक उसने फिर से आवाज़ सुनी, "किस सोच में डूब गयी, सुनिधी?"



सुनिधी एकदम घबरा गयी और उसके मुंह से निकला, "कुछ नहीं, कुछ नहीं सोच रही...."



आवाज़ ने कहा, "मैं तुम्हारी अंतरात्मा की आवाज़ हूँ..."



"हाँ बोलो। "सुनिधि का भय काफूर हो गया। जैसे सूरज की रोशनी के आगे छोटे छोटे बादल टिकते नहीं ।



"तुम पूरब में निकल कर पश्चिम में छिपने वाला सूरज हो यह भ्रम मत पालो। तुम आत्मा की तरह अजर और शक्तिमान हो । सूरज कभी छिपता नहीं वह अजर अमर निरंतर यूँ ही चलता रहता है।



कुछ देर के लिए आँखों से उसकी ओझलता को हम छिपने का भ्रम पाल लेते हैं ।



ऐसे ही स्त्रियां अपनी शक्ति को नहीं पहचानती तुम्हारी तरह। अपनी शक्ति को पहचानो और कुछ अलग करने की कोशिश करो। दुनिया को कोई विशिष्ट तोहफ़ा दो अपने कर्म से।



बहुत काम है। ग़रीब बच्चों को पढ़ाओ। मजबूरों का सहारा बनो। यूँ ही वक्त को जाया मत करो ।



यह भ्रम मत पालो कि तुम वक्त को काट रही हो वरना वह तो तुम्हारे हाथो से रेत के मानिंद सरकता जा रहा है।



मनुष्य जीवन को सार्थक करो। स्त्री जाति को नई पहचान दो। उठो आगे बढ़ो और कुछ करो। शीशी में बंद सुन्दर सी गुड़िया मत बनो।

कर्म की भट्टी में तपो और कुंदन बनो।"



आँख बंद करके सुनिधि सब सुनती रही। आत्मा मुस्करा रही थी। एक आलौकिक तेज़ सुनिधि के चेहरे पर छा गया आत्मविश्वास का तेज़ ।



वह उठी घर की अलमारियों में पड़ी किताबें कॉपियां उठाई और निश्चय किया कि आज से कुछ ग़रीब बच्चों को जाकर चिह्नित करेगी और उनको पढ़ा कर अपने समय का सदुपयोग करेगी ।



मित्रों,



अगर आप शिक्षित हैं और आप के पास किसी चीज़ की कमी नहीं है तो अपने समय के कुछ घंटे प्रतिदिन कुछ गरीब लोगों को दे दीजिये.



आप नहीं पढ़ा सकते तो कुछ पैसे देकर अशिक्षित गरीब बच्चों को किसी स्कूल में या किसी शिक्षक के पास तो भेज ही सकते हैं. थोड़े से पैसे का दान करके आप भी इस दुनिया को और सुन्दर बना सकते हैं.



किसी की मदद Kisi Ki Madad



मोहिनी एक गरीब परिवार से थी. गरीब होते हुए भी वो लोगों की बहुत मदद किया करती थी. उसके पास ज्यादा पैसे तो नहीं होते थे, परन्तु वो कभी भी किसी की सहायता करने में संकोच नहीं करती थी. मोहिनी एक दफ्तर में काम करती थी और ठीक ठाक पैसे भी प्राप्त करती थी.



एक दिन सुबह जब वो अपने दफ्तर जा रही थी, उसकी एक चप्पल टूट गयी. वो बहुत ही असमंजस में थी क्योंकि उसका दफ्तर दूर था और आस पास कोई मोची भी नहीं दिख रहा था.



पास में ही एक पार्क था. अचानक उसने देखा के एक लड़का पार्क के बाहर जूते पौलिश कर रहा था.



मोहिनी को थोड़ी हैरानी हुई क्योंकि उस लड़के के अपने पैरों में चप्पल या जूते नहीं थे परन्तु वो लोगों के जूते चमका रहा था और मरम्मत कर रहा था.



मोहिनी ने उस लड़के से कहा, "क्या तुम मेरी चप्पल ठीक कर दोगे?" वो पास के एक बेंच पर बैठ गयी. वो लड़का बहुत ही व्यस्त था क्योंकि वहां पहले से ही चार पांच लोग अपने जूते और चप्पलें लेकर खड़े थे. मोहिनी को कुछ समय प्रतीक्षा करनी पडी.



बैठे बैठे उसने लड़के से बातें करनी शुरू कर दी, "तुम्हारा नाम क्या है? तुम कहाँ रहते हो?"



उस लड़के ने काम करते करते कहा, "दीदी, मेरा नाम भावुक है और मैं यहीं नजदीक की एक कॉलोनी में रहता हूँ."



मोहिनी ने फिर कहा, "क्या तुम्हारे घर में कोई बड़ा नहीं है? तुम ये काम क्यों कर रहे हो? तुम स्कूल क्यों नहीं जाते?"



इतने प्रश्न सुन कर भावुक थोड़ा सा सकपका गया परन्तु उसने कहा, "दीदी, मैं ही अपने घर में सबसे बड़ा हूँ. मैं अनाथ हूँ. मेरा एक छोटा भाई और एक छोटी बहन है. मुझे उनको भी खिलाना पड़ता है. वो दोनों स्कूल जाते हैं. मैं काम करता हूँ और वो दोनों पढ़ते हैं.



मेरे माँ बाप गरीब थे और वो मुझको नहीं पढ़ा सके. मैं अपने भाई बहन को पढ़ाना चाहता हों. उनको मैं खुश देखना चाहता हूँ."



उसकी बातें सुनकर, मोहिनी की आंखें भर आयी. उस दिन वो अपनी चप्पल मरम्मत करवा कर चली गयी. उसने उस लड़के से और कुछ नहीं कहा. दफ्तर जाते समय उसके दिमाग में बहुत से प्रश्न उठ रहे थे. वो उस लड़के से और भी बहुत सी बातें करना चाहती थी.



उसके दफ्तर में उस दिन उसको बताया गया के उसकी तनख्वाह में बीस प्रतिशत की वृद्धि हो गयी थी.



वो बहुत खुश हुई के अब उसको ज्यादा पैसे मिला करेंगे. अचानक उसको वो लड़का भावुक याद आ गया. वो उसके बारे में सोचते सोचते परेशान सी हो गयी. वो उसकी कुछ मदद करना चाहती थी.



शाम तक काम करते करते वो उस लड़के और उसके छोटे भाई और बहन के बारे में ही सोचती रही. उसने निर्णय किया के अपनी बड़ी हुई तनख्वाह में से वो आधे पैसे यानी अपनी तनख्वाह के दस प्रतिशत वो भावुक को दे देगी ताकि उसको कुछ मदद हो सके.



उसने भावुक को पैसे भेजने शुरू कर दिए परन्तु भावुक को ये नहीं मालूम चला के हर महीने उसको पैसे कौन भेजता था. उसने अपने भाई और बहन को और अच्छे स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया था.



हर महीने की पहली को एक व्यक्ति आता था और उसको पैसे देकर चला जाता था. उस व्यक्ति को मोहिनी भेजती थी.



एक दिन भावुक ने उस इंसान का पीछा किया क्योंकि वो पता लगाना चाहता था के उसको हर महीने पैसे कौन भेज रहा था. मोहिनी उसको पिछले तीन सालों से मदद कर रही थी.



पैसे देने वाला व्यक्ति मोहिनी के दफ्तर में चला गया. भावुक भी उसके पीछे पीछे उस दफ्तर में आ गया. उसने मोहिनी से कहा, "मैडम, अब वो लड़का खुश है और उसके भाई और बहन अच्छे स्कूल में पढ़ रहे हैं."



भावुक ने ये सब बाहर से सुन लिया था. वो नहीं जानता था के वो लड़की कौन थी और उसकी मदद क्यों कर रही थी.



कुछ देर बाद वो भी मोहिनी के दफ्तर में चला गया और बोला, "आप कौन हैं और आप इतने सालों से मेरी मदद क्यों कर रही हैं?"



मोहिनी ने मुस्कुरा कर कहा, "तुमने एक दिन मेरी चप्पल ठीक की थी. याद है क्या? मैं तुम्हारी मदद करती हूँ क्योंकि मुझको अच्छा लगता है और तुमको अपने भाई बहन को पढ़ाना है. कुछ रिश्ते बहुत ही अनोखे होते हैं."



भावुक की आँखों में आंसू आ गए. अगले महीने वो फिर से मोहिनी के दफ्तर में आया और अपने साथ एक मिठाई का डिब्बा भी लाया, "दीदी ये मिठाई आपके लिए.



अब आप पैसे भेजना बंद कर दें. मैंने एक छोटी सी जूतों की दुकान खोल ली है. दुकान अच्छी चल गयी है......"



मोहिनी ने अपनी कुर्सी से उठकर उसके हाथ से मिठाई का डिब्बा ले लिया और उसके सर पर हाथ रख कर बोली, "काश सब के तुम्हारे जैसे भाई होते....!"



मित्रों,



जब भी आप कर सकें किसी गरीब की मदद कर दीजियेगा ताकि वो अपने पैरों पर खड़ा हो सके और अपने और अपने परिवार के सपनो को पूरा कर सके.



ज़रुरी नहीं है की इंसान किसी की मदद तभी करे जब उसको जानता हो. कुछ रिश्ते अनोखे होते है तो ज़रा सी डोर से ही जुड़ जाते हैं।



सच्चे दोस्त Sachhe Dost



जॉन, एक बहुत ही प्रसिद्द चित्रकार, जर्मनी के बर्लिन शहर में रहते थे. उनके बनाये गए चित्र बहुत ही ऊँचे मूल्यों पर बिका करते थे.



उनकी प्रदर्शनियों में उनके चित्रों को देखने और खरीदने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ आती थी. उनका एक भी चित्र ऐसा नहीं होता था जो नहीं बिक जाता था.



जब भी लोग जॉन को पूछा करते थे के उनका सर्वश्रेष्ठ चित्र कौन सा था तो वो कहते थे के अभी सबसे अच्छा चित्र बनाना बाकी था. वो कभी भी ये निश्चित नहीं कर पाए थे के उनका सबसे अच्छा चित्र कौन सा था.



जॉन का कुत्ता जैकब ही उनका सबसे अच्छा दोस्त था. वही उनका परिवार था और उनके जीवन की सबसे मूल्यवान निधि था. जैकब उनके साथ हर प्रदर्शनी में जाता था. वो दोनों हमेशा ही साथ साथ देखे जाते थे.


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