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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 22)

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 22)

राजा शर्मा

Copyright@2018 राजा शर्मा Raja Sharma

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 22)

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दो शब्द

स्वामीजी कक्षा में Swamiji Kaksha Mein

मोची की रोटी Mochi Ki Roti

स्वामी विवेकानंद की परीक्षा Swami Vivekanand Ki Pareeksha

उनको अच्छा लगता है Unko Achha Lagta Hai

पिकासो का जवाब Picasso Ka Jawaab

बराबर बराबर जमीन Barabar Barabar Jameen

कपास, सुई, और मोमबत्ती Kapas, Sui, Aur Mombatti

भाई के हाथ Bhai Ke Haath

छोटा लड़का Chota Ladka

घमंडी अमीर लड़की Ghamandi Amir Ladki

टूटे रिश्ते Tootey Rishtey

यहूदी आचार्य Yahudi Acharya

औरों से तुलना Auron Se Tulna

वो खिला देता है Wo Khila Deta Hai

भगवान् से बातें Bhagwaan Se Batein

रेत का घर Ret Ka Ghar

कलयुग का मानव Kalyug Ka Maanav

मनुष्यरुपी भगवान् Manushyaroopi Bhagwaan

पूर्ण समर्पण Poorn Samarpan

यादें Yadein

भीतर देखिये Bheetar Dekhiye

भगवान् दिखा दो Bhagwaan Dikha Do

मैं समझ जाता Main Samajh Jata

एक साथ सीखिए Ek Saath Seekhiye

काश मैं.....होता.....! Kash Main Hota!


दो शब्द


विश्व के प्रत्येक समाज में एक पीढ़ी द्वारा नयी पीढ़ी को कथाएं कहानियां सुनाने की प्रथा कई युगों से चलती चली आ रही है. प्रारंभिक कथाएं बोलकर ही सुनायी जाती थी क्योंकि उस समय लिखाई छपाई का विकास नहीं हुआ था. जैसे जैसे समय बीतता गया और किताबें छपने लगी, बहुत सी पुरानी कथाओं ने नया जीवन प्राप्त किया.


इस पुस्तक में हम आपके लिए 25 प्रेरणा कथाएं लेकर आये हैं. यह इस श्रंखला की बाईसवीं पुस्तक है. हर कथा में एक ना एक सन्देश है और इन कथाओं में युवा पाठकों, विशेषकर बच्चों, के दिमाग में सुन्दर विचार स्थापित करने की क्षमता है. ये पुस्तक आपको निराश नहीं करेगी क्योंकि ये कहानियां दुनिया के विभिन्न देशों और समाजों से ली गयी हैं.


कहानियां बहुत ही सरल भाषा में प्रस्तुत की गयी हैं. आप अपने बच्चों को ऐसी कहानियां पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करके उनपर बहुत उपकार करेंगे. आइये मिलकर कथाओं की इस परम्परा को आगे बढ़ाएं.


बहुत धन्यवाद


राजा शर्मा


स्वामीजी कक्षा में Swamiji Kaksha Mein


एक बार स्कूल में भोजन के समय नरेंद्र (स्वामी विवेकानंद) अपने मित्रों के साथ बातें कर रहे थे. सभी मित्र नरेंद्र को बहुत ही ध्यान से सुन रहे थे. उनकी बातों में सभी मित्र इतना डूब गए थे के उनको ध्यान ही नहीं रहा के उनके आस पास क्या हो रहा था.


घंटी लगने के बाद सभी छात्र अपनी अपनी सीट पर संभल कर बैठ गए. शिक्षक ने कक्षा में प्रवेश किया और अपना विषय पढ़ाना शुरू कर दिया. कुछ समय बाद शिक्षक ने कक्षा में कुछ फुसफुसाहट की आवाजें सुनी. शिक्षक ने देखा के पीछे की पंक्ति में बैठे कुछ छात्र बातें कर रहे थे.


शिक्षक को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने बातें करने वाले छात्रों से पूछना शुरू किया के उन्होंने अभी अभी क्या पढ़ाया था. उन छात्रों में से कोई भी शिक्षक को नहीं बता सका के वो क्या पढ़ा रहे थे क्योंकि वो छात्र तो बातों में लगे हुए थे.


शिक्षक ने वही बात नरेंद्र (स्वामी विवेकानंद) से भी पूछी. नरेंद्र ने हर एक प्रश्न का बिलकुल सही उत्तर दिया.


शिक्षक ने सभी छात्रों से पूछा, "कक्षा में कौन सा वो छात्र है जो सबको बातों में लगाए हुआ था. वो छात्र कौन है जो पढाई के दौरान भी और छात्रों के साथ बातें करने में लगा हुआ था."


सभी छात्रों ने नरेंद्र की तरफ संकेत किया परन्तु शिक्षक ये मानने को तैयार नहीं थे क्योंकि कक्षा में सिर्फ नरेंद्र ने ही शिक्षक के द्वारा पूछे गए सभी प्रश्नो के उत्तर ठीक ढंग से दिए थे. शिक्षक ने सोचा के कक्षा के अन्य सभी छात्र झूठ बोल रहे थे.


शिक्षक ने पूरी कक्षा को दंड दिया और उन सबको अपनी अपनी बेंच पर खड़ा हो जाने का आदेश दिया. शिक्षक ने नरेंद्र को सजा नहीं दी, परन्तु नरेंद्र स्वयं ही बेंच पर खड़े हो गए.


शिक्षक ने नरेंद्र से कहा, "तुम नीचे उतरो और अपनी सीट पर बैठ जाओ."


नरेंद्र ने कहा, "नहीं सर, मुझे भी खड़ा रहना होगा क्योंकि मैंने ही इन सब को बातों में लगाया था."


मित्रों,


कहते हैं न पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं अर्थात मेधावी और विद्वान लोगों की पहचान बचपन में ही हो जाती है. स्वामी विवेकानंद और उन जैसे अन्य महापुरुष अपने बाल्यकाल से ही सत्य के रास्ते पर चले थे और कभी भी वो मार्ग नहीं छोड़ा था.


सत्य के रास्ते में रुकावटें आती हैं, सत्य बदनाम कर सकता है, सत्य जीवन में कठिनाइयां उत्पन्न कर सकता है, परन्तु सत्य कभी झुक नहीं सकता और अंत में सत्य की ही विजय होती है.


हमें अपने बच्चों को स्वामी विवेकानंद और उन जैसे अन्य महापुरुषों के जीवन के बारे में बताना चाहिए. कुछ समय अपने बच्चों को ऐसी कहानियां सुनाने में भी खर्च किया कीजिये.


मोची की रोटी Mochi Ki Roti



एक बार स्वामी विवेकानंद राजस्थान में भ्रमण कर रहे थे. एक दिन वो एक गाँव में पहुंचे और वहां विश्राम करने लगे. जब लोगों को उनके आने का समाचार मिला, आस पास के गांवों से भी बहुत से लोग उनके दर्शन करने और उनसे बहुत से प्रश्न पूछने आने लगे.


स्वामी जी दिन रात आने वाले लोगों से मिलते रहे और उनके प्रश्नो के उत्तर देते रहे. इस तरह तीन दिन और तीन रातें बीत गयीं. लोगों से आध्यात्मिक बातें करने में स्वामीजी इतने डूबे रहे के उनको कुछ खाने या पीने का समय ही नहीं मिला. तीन दिन से उन्होंने एक घूँट पानी भी नहीं पिया था.


तीसरी रात को जब सभी लोग चले गए, एक गरीब व्यक्ति स्वामी जी के पास आया और बोला, "स्वामीजी मैंने देखा है के आप तीन दिनों से लोगों से बातें करने में इतने व्यस्त रहे के आपने कुछ खाया पिया ही नहीं है. मुझे तो बहुत ही दुःख पहुंचा है"


उस गरीब व्यक्ति को देखकर स्वामी जी को ऐसा लगा के जैसे साक्षात् भगवान् ने उनको दर्शन दे दिए हों. स्वामीजी ने उस गरीब व्यक्ति से कहा, "क्या आप कृपया मुझको कुछ खाने के लिए दे सकते हैं?"


गरीब व्यक्ति पेशे से एक मोची था और वो नीची जाति से था. उस गाँव के ऊँची जाति के लोग तो उसके पास भी नहीं आते थे. उस बेचारे ने डरते डरते स्वामी जी से कहा, "स्वामी जी, मैं आपके लिए रोटी बना कर लाना चाहता हूँ, परन्तु मैं नीची जाती से हूँ. मेरी छुई हुई रोटी आप कैसे खाएंगे?"


स्वामी जी उस व्यक्ति को देख कर मुस्क़ुराने लगे पर उन्होंने कुछ भी नहीं कहा. उस गरीब व्यक्ति ने फिर कहा, "अगर आप अनुमति दें तो मैं आपके लिए खाना पकाने का सामान ला देता हूँ ताकि आप स्वयं ही पका कर खा लें."


स्वामीजी ने कहा, "नहीं, तुम जो कुछ भी पकाकर मेरे लिए लाओगे मैं वही खा लूंगा."


बेचारे गरीब मोची को भय लगने लगा के बाद में ऊँची जाति के लोग उसको दंड देंगे क्योंकि उसने सन्यासी को अपने हाथ से पकाया हुआ खाना दिया था. वो स्वामीजी की सेवा करना चाहता था इसीलिए वो तुरंत गया और कुछ ही समय में गरमा गरम रोटियां पकाकर ले आया.


स्वामीजी ने उसके द्वारा लायी हुई रोटियां और सब्जी बड़े ही चाव से खाई. वो उस गरीब की उदारता और स्वार्थविहीन सेवा और प्रेम देखकर बहुत ही प्रभावित हुए. उन्होंने उस गरीब मोची को धन्यवाद दिया.


इसी बीच ऊंची जाति के लोगों को मालूम हो गया के गांव के एक नीची जाति के व्यक्ति ने स्वामीजी को खाना खिला दिया था. उन्होंने स्वामीजी से इसके बारे में पुछा और कहा के नीच जाति के व्यक्ति के हाथ का खाना खाना ठीक नहीं था.


स्वामीजी ने उनकी बात सुनने के बाद उनसे कहा, "तुम लोगों के साथ मैं तीन दिन तक बातें करता रहा परन्तु तुममे से किसी ने भी मुझसे या नहीं पूछा के मैंने कुछ खाया पिया था के नहीं. आप लोग स्वयं ये सज्जन लोग कहते हैं और ऊंची जाति का मानते हैं, परन्तु ये ठीक नहीं है.


सबसे शर्मनाक बात तो ये है के आप अपनी ऊँची जाति का बखान करते हैं और नीची जाति के इस मोची का तिरस्कार करते हैं, परन्तु आप इस गरीब मोची की मानवता और उदारता नहीं देखते. ऐसे सज्जन व्यक्ति की आलोचना करते हुए आपको शर्म नहीं आती?"


गाँव के उच्च जाति के लोगों के सर शर्म से झुक गए और उन्होंने स्वामीजी से अपने बुरे व्यवहार के लिए क्षमा मांग ली.


मित्रों,


हम सभी मनुष्य हैं और सब एक जैसे ही हैं, हां हमारे रंग रूप थोड़े फरक फरक हो सकते हैं. हमने खुद को इतनी जातियों और धर्मों में बाँट लिया है के जीना ही मुश्किल हो गया है.


मैं नहीं जानता के जाति धर्मो ने मानवजाति के लिए क्या अच्छा किया है परन्तु मैं इतना अवश्य जनता हूँ के धर्म और जातियों के झगड़ों के कारण हजारों लाखों निर्दोष लोग लगभग हर वर्ष ही मार दिए जाते हैं. मुझे कभी कभी शर्म आती है के हम अपने आप को सबसे सभ्य प्राणी कहते हैं.


स्वामी विवेकानंद की परीक्षा Swami Vivekanand Ki Pareeksha


स्वामी विवेकानंद जी को पूर्वी और पश्चिमी संस्कृतियों का बहुत ज्ञान था. वो एक बहुत ही दक्ष वक्ता थे और कुशल वार्ताकार भी थे.


उनके आध्यात्मिक ज्ञान के परिणामस्वरूप उनको १८९३ में विश्व धर्म संसद में आमंत्रित किया गया था. वो महान कार्यक्रम शिकागो में होने वाला था.


अमेरिका जाने से सिर्फ एक दिन पहले स्वामी विवेकानंद जी को उनकी माँ ने परिवार के साथ रात का खाना खाने के लिए आमंत्रित किया.


उनकी माँ ने अपने हाथों से स्वामीजी के मनपसंद खाने तैयार किये थे. उन्होंने बहुत ही प्रेम से अपने बेटे को उस रात का भोजन कराया. उसके बाद उनकी माँ एक कटोरे में कुछ फल ले कर आ गयी. स्वामी जी चाक़ू से काट कर फल खाने लगे.


कुछ देर बाद, स्वामी जी की माँ ने स्वामी जी से कहा, "बेटा, जरा वो चाक़ू तो मुझे देना."


स्वामीजी ने तुरंत ही चाकू उठा कर अपनी माँ को दे दिया.


चाकू अपने हाथ में लेने के बाद उनकी माँ ने कहा, "बेटा, तुमने मेरी परीक्षा तो पास कर ली है. मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है. तुम्हारी यात्रा सुखद और सफल हो."


स्वामीजी हैरान हुए और उन्होंने अपनी माँ से पूछा, "लेकिन माँ मैंने आपकी परीक्षा कब पास की?"


उनकी माँ ने मुस्कुरा कर कहा, "बेटा, अभी अभी. जब मैंने तुमसे चाक़ू मांगा, वही तुम्हारी परीक्षा थी. तुमने लोहे वाले भाग को अपने हाथ में पकड़ा और लकड़ी वाले भाग को मेरी तरफ किया था.


तुमने धार या लोहे वाला भाग मेरी तरफ नहीं किया ताकि मेरे हाथ में घाव न हो जाए.


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