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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 21)

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 21)

राजा शर्मा

Copyright@2018 राजा शर्मा Raja Sharma

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 21)

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दो शब्द

मैंने गालियां नहीं स्वीकारी Maine Galiyan Nahi Sweekari

बच्चे का मित्र Bachhey Ka Mitr

मैं आपका बेटा Main Apka Beta

जेंटलमैन (सज्जन पुरुष) Gentleman

बाप बेटा Baap Beta

वो गुरु का सिख Wo Guru Ka Sikh

देने वाले के हाथ Deney Waley Ke Hath

तुम पाप करती हो Tum Paap Karti Ho

थोड़ी सी ख़ुशी Thodi Si Khushi

भगवान, जैसा चाहो करो Bhagwaan Jaisa Chaho Karo

चार पत्नियां Chaar Patniyaan

मौत का डर Maut Ka Dar

नहीं भाग सकते Nahi Bhaag Saktey

सुखी दंपत्ति Sukhi Dampatti

घटता प्रेम Ghatata Prem

बीरबल और उसका दोस्त Birbal Aur Uska Dost

बुजुर्गों की भी सुनिए Bujurgon Ki Bhi Suniye

रिश्तों के हीरे Rishton Ke Heerey

जैसे चाहूंगी वैसे जियूँगी Jaise Chahungi Vaise Jiyungi

एक मौका और Ek Mauka Aur

बनारसी साड़ी Banarasi Saree

माँ की चिट्ठी Maa Ki Chitthi

प्रोफेसर और छात्र Professor Aur Chatra

एक थप्पड़ Ek Thappad

चुरा कर लाओ Chura Kar Lao



दो शब्द


विश्व के प्रत्येक समाज में एक पीढ़ी द्वारा नयी पीढ़ी को कथाएं कहानियां सुनाने की प्रथा कई युगों से चलती चली आ रही है. प्रारंभिक कथाएं बोलकर ही सुनायी जाती थी क्योंकि उस समय लिखाई छपाई का विकास नहीं हुआ था. जैसे जैसे समय बीतता गया और किताबें छपने लगी, बहुत सी पुरानी कथाओं ने नया जीवन प्राप्त किया.


इस पुस्तक में हम आपके लिए 25 प्रेरणा कथाएं लेकर आये हैं. यह इस श्रंखला की इक्कीसवीं पुस्तक है. हर कथा में एक ना एक सन्देश है और इन कथाओं में युवा पाठकों, विशेषकर बच्चों, के दिमाग में सुन्दर विचार स्थापित करने की क्षमता है. ये पुस्तक आपको निराश नहीं करेगी क्योंकि ये कहानियां दुनिया के विभिन्न देशों और समाजों से ली गयी हैं.


कहानियां बहुत ही सरल भाषा में प्रस्तुत की गयी हैं. आप अपने बच्चों को ऐसी कहानियां पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करके उनपर बहुत उपकार करेंगे. आइये मिलकर कथाओं की इस परम्परा को आगे बढ़ाएं.


बहुत धन्यवाद


राजा शर्मा


मैंने गालियां नहीं स्वीकारी Maine Galiyan Nahi Sweekari


एक बार बुद्धा एक पेड़ के नीचे ध्यान लगाए बैठे थे. वहाँ से एक व्यक्ति गुज़र रहा था. बुद्धा को पेड़ के नीचे देखकर उसने बुद्ध को गालियां देनी शुरू कर दी.


बहुत देर तक गालियां देने के बाद वो व्यक्ति वहीं खड़ा होकर प्रतीक्षा करने लगा के बुद्धा की क्या प्रतिक्रिया होती है. बहुत समय बीत गया परन्तु बुद्धा ध्यानमग्न रहे और उन्होंने कोई भी प्रतिउत्तर नहीं दिया.


उस व्यक्ति को बहुत गुस्सा आया और उसने और भी गन्दी गन्दी गलियां बकना शुरू कर दिया. वो बुद्धा का अपमान करने लगा, परन्तु बुद्धा ने कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दिखाई. कई घंटो तक वो गालियां देता रहा और बुद्धा अपने स्थान पर शांतिपूर्वक बैठे रहे.


जब उस व्यक्ति से सहन नहीं हुआ, उसने बुद्धा से पूछा, "मैं इतनी देर से आपको गालियां दे रहा हूँ, क्या आपको मुझपर क्रोध नहीं आता?"


बुद्ध ने मुस्कुरा कर कहा, "बिलकुल नहीं क्योंकि मैंने तुम्हारी गालियां स्वीकार ही नहीं की हैं."


वो व्यक्ति समझ नहीं सका और उसने कहा, "परन्तु आपने मेरी गालियां सुनी, एक एक शब्द सुना?"


बुद्धा ने कहा, "मुझे गालियां चाहिए ही नहीं तो मैं सुनूंगा ही क्यों?"


वो व्यक्ति तो जैसे पागल ही जो गया. बुद्धा उस व्यक्ति की स्तिथि समझ गए और उन्होंने आगे बोलना शुरू किया, "वो सभी गालियां तुम्हारे पास ही हैं."


वो व्यक्ति बोला, "जब मैंने वो सब गालियां आपको दे दी तो वो मेरे पास कैसे हैं?"


बुद्धा ने उस व्यक्ति से पूछा, "मानो तुम किसी व्यक्ति को कुछ सिक्के देते हो और वो व्यक्ति उनको नहीं लेता तो सिक्के तुम्हारे पास रहते हैं के नहीं?"


उस व्यक्ति ने कहा, "जब वो ले ही नहीं रहा, तो सिक्के तो मेरे पास ही रहेंगे ना."


बुद्धा ने मुस्कुरा कर कहा, "यही तो तुम्हारी गालियों के साथ हुआ. तुम मुझको गलियां देते रहे, परन्तु मैंने गालियां स्वीकारी ही नहीं. जब मैंने ली ही नहीं तो गालियां तुम्हारे पास ही रही के नहीं? तो फिर मेरे पास तो क्रोध करने का कोई कारण ही नहीं है."


उस व्यक्ति को अपनी गलती का आभास हो गया और वो बुद्धा के चरणों में गिरकर माफ़ी मांगने लगा.


मित्रों,


लोग अगर कभी क्रोध में आपको कुछ कह भी दें, तो कृपया कभी भी जवाब मत दीजिये. संतोष के साथ जीवन बिताने के लिए आंतरिक शांति की आवश्यकता होती है. किसी भी बाहरी शक्ति को आपको विचलित करने की अनुमति मत दीजिये.


बच्चे का मित्र Bachhey Ka Mitr


जिमी अपने परिवार के साथ शहर में रहता था परन्तु उसको ग्रामीण क्षेत्र में प्रकृति के बीच रहकर समय बिताना बहुत अच्छा लगता था.


एक बार अपने बेटे के जन्मदिन को मनाने के लिए वो अपने परिवार और कुछ मित्रों के साथ शहर के पास के एक जंगल में गए. उन्होंने कुछ दिन वहीँ बिताने की योजना बनायी थी.


उन्होंने जंगल में एक कॉटेज किराए पर ले लिया था. वहां पर मेहमानो के लिए सभी सुविधाएं उपलब्ध थी और चारों तरफ प्रकृति के अद्भुत नज़ारे थे. वो अपने कॉटेज से ही बहुत से जंगली जानवरों को जंगल में घूमते हुए देख सकते थे.


पहले दिन जब वो अपने कॉटेज की तरफ जा रहे थे, उन्होंने रास्ते में एक छोटा सा कुत्ता देखा. जिमी के दो वर्ष के बेटे ने उस कुत्ते को एक बिस्किट दे दिया.


कुत्ता उसके छोटे छोटे हाथों से वो बिस्किट लेकर बहुत ही खुश हुआ और पूँछ हिलाने लगा. कुछ ही समय में वो कुत्ता और जिमी का दो वर्ष का बेटा मित्र बन गए. उसके बाद वो कुत्ता हमेशा जिमी के बेटे के पास ही रहने लगा.


उनके भ्रमण के तीसरे दिन, उन्होंने जिमी के बेटे का जन्मदिन खूब अच्छे से मनाया. खूब खाया पिया और उस छोटे कुत्ते को भी खाने के लिए चिकन, बिस्किट्स,और अन्य चीज़ें दी.


अगले दिन सभी ने जंगल में जाकर छोटे जानवरों का शिकार करने की योजना बनायी. जिमी के बेटे को उसकी आया के साथ छोड़कर सब लोग जंगल चले गए. जिमी का बेटा और उसकी आया कॉटेज में ही रहे.


कुछ घंटों के बाद जिमी और उसकी पत्नी सबसे पहले वापिस आने वालों में से थे. उन्होंने देखा के कॉटेज का मुख्य दरवाजा खुला हुआ था और सामने के बड़े कमरे में कोई भी नहीं था.


उन्होंने अपने बेटे को आवाज लगाईं परन्तु कोई जवाब नहीं आया. उनको बहुत ही चिंता हुई. उन्होंने खोजना शुरू कर दिया.


अचानक उनको वो कुत्ता दिखाई दिया. उसके मुहं पर खून लगा हुआ था. जिमी और उसकी पत्नी तो भयभीत हो गए. उन्होंने जोर जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया. सभी लोग दौड़ते हुए वहाँ आ गए.


जब उन्होंने कुत्ते के मुंह पर खून देखा, उन्होंने सोचा के कुत्ते ने जिमी के बेटे को काट लिया था. सबने मिलकर उस कुत्ते को पीटना शुरू कर दिया.


ठीक उसी समय आया और जिमी का बेटा भी कॉटेज में वापिस आ गए. बच्चे को सुरक्षित देखकर सबने राहत की सांस ली. उन्होंने कुत्ते को मारना छोड़ दिया. बेचारा कुत्ता दर्द से काँप रहा था. परन्तु उनको समझ नहीं आया के कुत्ते के मुंह पर वो खून कहाँ से आया था.


उसी समय आया ने कहा के एक भेड़िया घूमता घूमता उनके कॉटेज के पास आ गया था. वो जिमी के बेटे पर आक्रमण करना चाहता था परन्तु उस कुत्ते ने उस भेड़िये का रास्ता रोक लिया और उससे भिड़ गया. उस कुत्ते ने तो भेड़िये से बच्चे की जान बचाई थी.


आया ने कहा के वो बच्चे को लेकर पीछे के एक कमरे में छुप गयी थी. ये सुनकर सभी को बहुत ग्लानि महसूस हुई के उन्होंने उस कुत्ते को पीटा था जिसने बच्चे की जान बचाई थी.


जिमी ने तुरंत ही उस कुत्ते की मरहम पट्टी की और उसको खूब दूध पीने को दिया. कुछ देर में कुत्ता सब कुछ भूल गया और फिर से बच्चे के साथ खेलने लगा.


वापिस आते समय वो लोग उस कुत्ते को भी अपने साथ शहर ले आये और वो कुत्ता उन के साथ परिवार के सदस्य के रूप में रहने लगा.


मित्रों,


बेजुबान जानवरों पर हम बहुत अत्याचार करते हैं. क्रोध में हम अपने पालतू जानवरों को भी पीट देते हैं. हमको ये नहीं भूलना चाहिए के उनको भी दर्द होता है और उनकी भी भावनाएं होती हैं, परन्तु उनको भगवान् ने एक विशेष गुण दिया है.


आप चाहे अपने पालतू जानवर को कितना भी पीट लें, वो आपको माफ़ कर देता है और सब कुछ भूल जाता है.


काश मनुष्य भी क्षमा करने का ये गुण बेजुबान कुत्तों से सीख सकते. मित्रों, जानवरों पर कभी भी अत्याचार मत कीजिये. अपने पालतू जानवरों को भी अपने बच्चों की तरह ही प्रेम कीजिये. वो आपसे सिर्फ थोड़ा सा भोजन और बहुत सारा प्रेम चाहते हैं.


मैं आपका बेटा Main Apka Beta


एक दिन स्वामी विवेकानंद जी अपने भाषण के बाद एक स्थान पर बैठकर विश्राम कर रहे थे. कुछ लोग स्वामी जी से मिलने के लिए आये. उनमें एक अमेरिकन स्त्री भी थी. वो जवान स्त्री बहुत ही सुन्दर थी.


वो स्त्री स्वामी जी को अपनी तरफ आकर्षित करके उनको संन्यास के रास्ते से पथभ्रष्ट करना चाहती थी. जब उसको स्वामीजी से अकेले में मिलने का अवसर प्राप्त हुआ, उसने स्वामीजी से कहा, "मैं आपकी बहुत बड़ी प्रशंसक हूँ. मैं आपसे विवाह करना चाहती हूँ."


स्वामी जी चकित हुए परन्तु उन्होंने मुस्कुराते हुए उस स्त्री से पूछा, "आप मुझसे विवाह क्यों करना चाहती हैं?"


उस स्त्री ने कहा, "मैं आपसे विवाह करके ठीक आप जैसा ही एक पुत्र प्राप्त करना चाहती हूँ. मैं आपके पुत्र की माँ बनना चाहती हूँ. वो बेटा ठीक आपकी तरह दिखेगा."


स्वामीजी फिर से मुस्कुराये और उस स्त्री के चरणों में झुक गए और बोले, "आप मेरी प्रतिकृति क्यों चाहती हैं? मैं तो असली विवेकानंद हूँ और मैं आपका पुत्र बनने को तैयार हूँ." स्वामी जी ने उस स्त्री के चरण छू लिए और कहा, "आप मेरी माँ हैं."


उस स्त्री को बहुत शर्म आयी और उसको ग्लानि होने लगी. उस समय उस स्त्री में स्वामी विवेकानंद जी से आंखें मिलाने की हिम्मत नहीं हुई. बाद में वो स्त्री स्वामीजी जी की अनुयायी बन गयी.


मित्रों,


एक सच्चे सन्यासी में असीमित आत्मबल होता है और उसको कोई भी वस्तु या स्त्री उसको रास्ते से पथभ्रमित नहीं करा सकती. सच्चा सन्यासी किसी भी स्थिति में अपने आप पर अपना नियंत्रण नहीं खोता है और बहुत ही संतुलित और बुद्धिमतापूर्ण उत्तर देता है.


जेंटलमैन (सज्जन पुरुष) Gentleman


एक बार स्वामी विवेकानंद जी को एक सम्मलेन में भाग लेने के लिए अमेरिका आमंत्रित किया गया था. एक सुबह स्वामीजी, शिकागो की एक सड़क पर घूम रहे थे.


स्वामी जी ने अपने दो भगवे वस्त्र पहने हुए थे. स्वामीजी साधुओं की तरह धोती और चादर पहनते थे और उनके सर पर भगवा पगड़ी होती थी.


अमेरिका के लोगों के लिए ऐसे वस्त्रों में किसी व्यक्ति को देखना एक नया अनुभव था. सड़क पर सब लोग उनको ही देखने लगे.


एक पति और उसकी पत्नी स्वामीजी के कुछ ही पीछे चल रहे थे. जैसे ही वो दोनों स्वामीजी के बराबर में चलने लगे, स्त्री ने अपने पति से कहा, "मेरे विचार में ये कोई सज्जन पुरुष (जेंटलमैन) तो नहीं हो सकता."


स्वामीजी ने उस स्त्री की ये टिपण्णी सुन ली. उन्होंने उस स्त्री के पास जाकर कहा, "मैडम, आपके देश में दरजी किसी व्यक्ति को सज्जन पुरुष (जेंटलमैन) बनाते हैं, परन्तु मैं जिस देश से आता हूँ वहाँ व्यक्ति को उसका चरित्र सज्जन परुष बनाता है."


पति पत्नी को तो जैसे सांप सूंघ गया और उनके मुंह में शब्द ही नहीं थे. उनको अपने बोले गए शब्दों के कारण ग्लानि होने लगी.


मित्रों,


ये तो सभी मानेंगे के एक व्यक्ति जिसने सूट बूट पहने हों उसको लोग सज्जन पुरुष या शिक्षित मान लेते हैं, परन्तु यदि कोई व्यक्ति धोती या साधारण वस्त्रों में हो तो उसको देखकर लोग सज्जन पुरुष नहीं मानते हैं. यही है उच्च अमीर समाज का सत्य.


ये भी सत्य है के जितने भी महापुरुष भारत में हुए हैं वो सभी बहुत ही साधारण कपड़ों में रहते थे और उनको देखकर कोई भी उनको साधू या फ़क़ीर ही समझता. यही है विडंबना के हम व्यक्ति को नहीं उसके वस्त्रों और सामान को सम्मान देते हैं.


बाप बेटा Baap Beta


एक दिन एक बूढा बाप और उसका बेटा घर के मुख्य कमरे में बैठे अपने अपने काम कर रहे थे. बेटे की उम्र ५६ वर्ष थी और बाप की उम्र ८४ वर्ष थी. अचानक उनके उस कमरे की खिड़की पर एक कौवा आकर बैठ गया.


पिता ने खिड़की की तरफ इशारा करते हुए बेटे से पूछा, "खिड़की पर क्या है?"


बेटे ने कहा, "कौवा है."


कुछ मिनटों के बाद बाप ने फिर से खिड़की की तरफ संकेत करके बेटे से पूछा, "खिड़की पर क्या है?"


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