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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 17)

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 17)

राजा शर्मा

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कथा सागर: 25 प्रेरणा कथाएं (भाग 17)

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दो शब्द

बाघ की मूंछें Bagh Ki Moonchein

मैं तुच्छ हूँ Main Tuchh Hoon

राजा आर्थर और डायन King Arthur Aur Dayan

ख़ुशी का रहस्य Khushi Ka Rahasya

मैंने नहीं देखा Maine Nahi Dekha

लाभ आधा आधा Labh Adha Adha

बेईमान डॉक्टर Beimaan Doctor

तितली और गुलाब Titli Aur Gulab

एक भगवान् की संताने Ek Bhagwan Ki Santanein

सच्चा मित्र Sachha Mitra

दुष्ट सन्यासी Dusht Sanyaasi

सच्चाई यही है Sachhai Yahi Hai

इतने उत्तर Itney Uttar

हम सब नौकर हैं Hum Sab Naukar Hain

डॉक्टर ने कहा है Doctor Ne Kaha Hai

सौ सिक्के दे दो Sou SIkke De Do

बेटा, मुझे मार दो पर Beta, Mujhe Mar Do Par

चाय का कप Chai Ka Cup

उदारता की सीमा Udaarta Ki Seema

अपनी अपनी प्रवृत्ति Apni Apni Pravarti

अपने पैसे वापिस ले लो Apne Paise Wapis Le Lo

घर जल गया Ghar Jal Gaya

बत्तख याद है के नहीं Battakh Hai Ke Nahi

लोभ क्या होता है Lobh Kya Hota Hai

निन्यानवे का चक्कर Ninyaanve Ka Chakkar



दो शब्द



विश्व के प्रत्येक समाज में एक पीढ़ी द्वारा नयी पीढ़ी को कथाएं कहानियां सुनाने की प्रथा कई युगों से चलती चली आ रही है. प्रारंभिक कथाएं बोलकर ही सुनायी जाती थी क्योंकि उस समय लिखाई छपाई का विकास नहीं हुआ था. जैसे जैसे समय बीतता गया और किताबें छपने लगी, बहुत सी पुरानी कथाओं ने नया जीवन प्राप्त किया.



इस पुस्तक में हम आपके लिए 25 प्रेरणा कथाएं लेकर आये हैं. यह इस श्रंखला की सत्रहवीं पुस्तक है. हर कथा में एक ना एक सन्देश है और इन कथाओं में युवा पाठकों, विशेषकर बच्चों, के दिमाग में सुन्दर विचार स्थापित करने की क्षमता है. ये पुस्तक आपको निराश नहीं करेगी क्योंकि ये कहानियां दुनिया के विभिन्न देशों और समाजों से ली गयी हैं.



कहानियां बहुत ही सरल भाषा में प्रस्तुत की गयी हैं. आप अपने बच्चों को ऐसी कहानियां पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करके उनपर बहुत उपकार करेंगे. आइये मिलकर कथाओं की इस परम्परा को आगे बढ़ाएं.



बहुत धन्यवाद



राजा शर्मा



बाघ की मूंछें Bagh Ki Moonchein



कोरिया के एक गाँव में युन ओके नाम की एक जवान पत्नी अपने पति के साथ बहुत ही खुश थी. उसका पति उसको बहुत प्रेम करता था और उसकी हर सुविधा का ख़याल रखता था.



एक दिन उस जवान पत्नी के पति को युद्ध का बुलावा आ गया. वो युद्ध में गया और बहुत बहादुरी से लड़ा.



वापिस आने के बाद उसके पति का व्यवहार बिलकुल बदल गया. वो बात बात पर क्रोध दिखाने लगा और अपनी पत्नी को बात बात पर शिकायतें करने लगा.



पत्नी अपने पति से बहुत ही डरने लगी और उस घर में उसका जीना ही दूभर हो गया. वो उन दिनों को याद करती थी जब उसका पति बहुत ही विनम्र था.



गाँव के पास ऊँचे पहाड़ों में एक गुफा में एक सन्यासी रहता था. जब भी गांव में कोई रोग फैलता था या कोई विपत्ति आती थी तो गांव के लोग उस सन्यासी के पास दौड़े चले जाते थे.



सन्यासी उनकी समस्याओं का समाधान कर देता था. युन ओके कभी भी उस सन्यासी से कोई मदद लेने के लिए नहीं गयी थी.



एक दिन वो अपने पति के व्यवहार से भयभीत होकर उस सन्यासी की गुफा की तरफ चल पडी. उसने सन्यासी को पूरी बात बताई के कैसे उसके पति ने उसके साथ दुर्व्यवहार करना शुरू कर दिया था.



सन्यासी ने उसको कहा, "प्रायः ऐसा होता है जब सिपाही युद्ध से वापिस घर आते हैं. तुम बताओ अब मैं क्या कर सकता हूँ?"



उस जवान पत्नी ने सन्यासी से कहा, "आप कोई ऐसी दवाई तैयार कर दीजिये या ऐसा कोई ताबीज़ दे दीजिये जिससे मेरे पति मेरे साथ पहले जैसा ही प्रेमपूर्ण व्यवहार करना शुरू कर दें."



सन्यासी ने उस जवान पत्नी को कहा, "तुम्हारी समस्या और लोगों की जैसी नहीं है. वो लोग तो किसी रोग की दवाइयां लेने आते हैं, पर तुम्हारी समस्या तो व्यवहारिक समस्या है."



जवान स्त्री ने कहा, "मैं जानती हूँ, महाराज."



सन्यासी ने कहा, "ऐसा करो तुम तीन दिन के बाद आओ. मैं तुम्हारी समस्या पर विचार करूंगा."



तीन दिन बाद युन ओके फिर से सन्यासी के पास पहुँच गयी. सन्यासी ने उसका स्वागत किया और कहा, "तुम्हारे लिए एक अच्छी खबर है.



एक दवाई है जिससे तुम्हारे पति को हम पहले जैसा बना सकते हैं, परन्तु उस दवाई को बनाने के लिए किसी जीवित बाघ की मूछें चाहिए होंगी. तुम किसी जीवित बाघ की मूछ का एक बाल ले आओ."



युन ओके तो एक दम घबरा गयी, "क्या? बाघ की मूंछ का बाल? ये तो असम्भव है!"



सन्यासी ने कहा, "बिना बाघ की मूंछ के बाल के मैं वो दवाई नहीं बना सकता! मैं बहुत व्यस्त हूँ, तुम जाओ और मूंछ का बाल ले कर आओ!"



उस रात युन ओके बिलकुल भी सो नहीं सकी. पूरी रात करवटें बदलते ही बीत गयी. वो यही सोचती रही के वो जीवित बाघ की मूंछ का बाल कैसे प्राप्त करेगी.



गाँव के पास के एक पहाड़ में एक बाघ देखा गया था. अगली सुबह, युन ओके ने एक कटोरा चावल और मीट पकाया और उसको लेकर पहाड़ की तरफ चल दी.



पहाड़ पर चढ़ते समय उसका दिल बहुत जोर जोर से धड़क रहा था. उसने एक स्थान पर चावल और मीट का कटोरा जमीन पर घास पर रख दिया. वो कुछ दूरी पर बैठ कर इंतज़ार करने लगी.



अगली सुबह भी वो मीट और चावल का कटोरा उसी स्थान पर रखने गयी. उसने अपनी जीभ चटखा कर आवाज़ उत्पन्न की. उसने देखा के पहले दिन वाला कटोरा खाली था. उसने नया कटोरा वहां रख दिया और घर आ गयी.



वो कई दिनों तक यही करती रही. इसी तरह कई महीने बीत गए. वो हर सुबह मीट और चावल का कटोरा रख आती थी और अगली सुबह खाली कटोरा ले आती थी.



कई महीने बीत जाने के बाद भी उसने बाघ को नहीं देखा. उसने जमीन पर बाघ के पंजो के निशान अवश्य देखे. उसको यकीन था के बाघ ही प्रतिदिन वो खाना खा रहा था. एक दिन उसने देखा के बाघ एक गुफा से बाहर देख रहा था.



वो चुप चाप उस स्थान पर गयी जहां वो कटोरा रखती थी. उसने खाने से भरा कटोरा रख दिया और खाली कटोरा उठा लिया.



कुछ हफ़्तों के बाद उसके कदमो की आहट सुनकर बाघ अपनी गुफा से बाहर आने लगा. युन ओके को पूरा विशवास था के एक दिन वो बाघ के बहुत पास पहुँच ही जाएगी.



एक महीना और बीत गया. उसने देखा के अब वो बाघ खाली कटोरे के पास बैठा इंतज़ार करने लगा था. उसने भरा कटोरा रख दिया और खाली कटोरा उठा लिया. बाघ ने खाने को सूंघा. युन ओके को लगने लगा के बाघ तो बहुत ही विनम्र प्राणी है.



अगली सुबह उसने बाघ को कुछ देर तक खाते हुए देखा. वो उसके रंग और आकर की प्रशंसा करने लगी.



अगले हफ्ते तक वो बाघ के बहुत पास तक पहुँच गयी और उसने खाना खाते हुए बाघ के सर पर हाथ भी फेर दिया. बाघ ने कुछ नहीं किया. वो तो एक बिल्ली की तरह ही था.



एक दिन जब वो बाघ के पास थी और उसके सर पर हाथ फेर रही थी, उसने सोचा के समय आ गया था जब उसको मूंछ का बाल ले लेना चाहिए. उस दिन वो एक छोटा सा चाक़ू भी साथ लाई थी. उसने खाने का कटोरा बाघ के सामने रख दिया और बाघ खाने लगा.



उसने बाघ से कहा, "क्या मैं तुम्हारी मूंछ का एक बाल ले सकती हूँ?" उसने बाघ के सर पर हाथ रख दिया. उसने अचानक एक बाल को नीचे से पकड़ा और एक झटके में ही उसको चक्कू से काट दिया.



बाघ ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई. उसने बाघ को धन्यवाद कहा और मूंछ का बाल लेकर घर आ गयी.



अगली सुबह जब उसका पति खेत पर काम करने चला गया, वो तुरंत उठी और सन्यासी की गुफा की तरफ दौड़ने लगी. मूंछ का बाल उसके हाथ में था. वो सन्यासी के सामने पहुँच कर जोर से चिल्लाई, "मैं बाल ले आयी! मैं बाल ले आयी!"



सन्यासी हैरान हो गया क्योंकि उसको यकीन ही नहीं हुआ. युन ओके ने फिर से कहा के वो बाघ की मूंछ का बाल ले आयी थी.



सन्यासी ने कहा, "अच्छा मुझे ये बताओ के तुमने ये बाल कैसे प्राप्त किया?"



युन ओके ने विस्तार से सन्यासी को सब बता दिया के कैसे उसको वो बाल लेने में ६ महीने लग गए थे. उसने कहा के उसने बाघ का विशवास जीत लिया था और फिर एक बाल काट लिया. उसने गर्वपूर्वक वो बाल सन्यासी की हथेली पर रख दिया.



सन्यासी ने देखा के वो वास्तव में ही बाघ की मूंछ का बाल था. अचानक उसने उस बाल को पास में जलती हुई आग में फेंक दिया. बाल तुरंत ही जलकर ख़ाक हो गया.



सन्यासी ने कहा, "युन ओके,अब इस बाल की जरूरत नहीं है.मुझे बताओ के बाघ अधिक खतरनाक होता है के मनुष्य? अगर तुम एक खतरनाक बाघ को मित्र बना सकती हो तो क्या तुम एक मनुष्य को मित्र नहीं बना सकती?"



युन ओके दंग हो गयी. उसको समझ आ गया था के सन्यासी क्या कहना चाहते थे.



वो समझ गयी थी के उसके लिए अपने बदले हुए पति को मित्र बना कर फिर से विनम्र बनाना उतना कठिन काम नहीं था. वो मुड़ी और अपने घर की तरफ दौड़ने लगी. वो जानती थी के उसको क्या करना था.



मित्रों,



कभी कभी पति या पत्नी में से कोई एक क्रोधित हो जाना कोई अनूठी बात नहीं है. यदि पति किसी कारण वश क्रोधित हो तो जहां तक हो सके उसका विरोध करना छोड़ देना चाहिए. उसके मन की बात जानने का प्रयास करना चाहिए.



क्रोधित पति के साथ अपने व्यवहार को विनम्र रखना चाहिए और ये ध्यान रखना चाहिए के कोई भी कदम जल्दी में ना उठाएं.



उसको धीरे धीरे बाघ की तरह ही मित्र बनाना होगा. कुछ दिन लग जाएंगे परन्तु पत्नी की विनम्रता और प्यार उसके पति को अवश्य ठीक कर देंगे.



मैं तुच्छ हूँ Main Tuchh Hoon



एक दिन मैं "समय का संक्षिप्त इतिहास" नाम की किताब पढ़ने बैठ गया. पहला अध्याय पड़ने के बाद ही मुझको आभास हो गया के ब्रह्माण्ड की तुलना में मनुष्य कितना तुच्छ होता है.



मुझे ऐसा लगने लगा के मैं तो एक बिंदु भी नहीं हूँ और मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं है.



रात को सोने से पहले मैंने अपने पिताजी से उस किताब के बारे में बात की. मैंने पिताजी से कहा, "मैं तो बहुत ही विचलित हो गया हूँ. क्या मेरी समस्या का कोई समाधान है?"



पिता जी ने मुझको कहा, "कौन सी समस्या?"



मैंने कहा, "यही समस्या के ब्रह्माण्ड की तुलना में हम कितने तुच्छ हैं?"



पिताजी ने कहना शुरू किया, "मानो तुम एक जहाज में हो और वो जहाज़ सहारा के रेगिस्तान में गिर जाता है. तुम जीवित बच जाते हो. तुम्हारे चारों तरफ हजारों मील तक रेगिस्तान की रेत ही रेत है.



तुम रेत के एक कण को एक चिमटी से उठाते हो और कुछ मिलीमीटर दूर रख देते हो. उस रेगिस्तान में क्या होगा?"



मैंने कहा, "मैं उस रेगिस्तान में प्यास से मर जाऊँगा."



पिताजी ने कहा, "नहीं, मेरा मतलब है के उस रेत के कण को एक स्थान से उठा कर दूसरे स्थान पर रख देने से क्या होगा?"



मैंने कहा, "मैं नहीं जानता क्या होगा."



पिताजी ने कहा, "इसके बारे में सोचो." मैं बहुत देर तक सोचता रहा परन्तु मैं कुछ भी नहीं कह सका.



मैंने कहा, "मैंने तो सिर्फ एक रेत के कण को एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर रख दिया था. इससे क्या मतलब निकालूँ?"



पिताजी ने कहा, "जब तुमने रेत का एक कण एक स्थान से उठा कर दूसरे स्थान पर रख दिया, तुमने सहारा रेगिस्तान को परिवर्तित कर दिया. सहारा कितना बड़ा रेगिस्तान है और बेटे तुमने उसको परिवर्तित कर दिया!"



मैं भी उठकर बैठ गया और जोर से बोला, "हां, बिलकुल सत्य है! मैंने सहारा रेगिस्तान को परिवर्तित कर दिया!"



पिताजी ने कहा, "इसका अर्थ क्या है? ये कोई कैंसर ठीक करने या मोना लिसा का चित्र बनाने जैसा कठिन काम नहीं है."



"हां पिताजी."



"बेटे, अगर तुमने सहारा रेगिस्तान के एक कण को एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर नहीं रखा होता तो रेगिस्तान में परिवर्तन नहीं आता. अगर तुम नहीं करते तो मानव इतिहास में एक घटना कम हो जाती. लेकिन तुमने कर दिया."



मैं बहुत खुश हो गया और बिस्तर पर खड़ा हो गया. मैंने अपनी उँगलियाँ ऊपर आकाश की तरफ उठाकर कहा, "मैंने ब्रह्माण्ड बदल दिया. मैंने ब्रह्माण्ड बदल दिया!"



"हां बेटा, तुमने ये कर दिया."



मित्रों,



ये सत्य है के ब्रह्माण्ड अनंत है और उसकी विशालता के आगे और पृथ्वी से बहुत बड़े बड़े लाखों करोड़ों गुना बड़े ग्रहों और तारों की सामने हमारी पृथ्वी एक बिंदु भी नहीं है तो मनुष्य की क्या हैसियत है. आप समझ ही गए होंगे.



हमारी पृथ्वी इतनी छोटी है जैसे आकाश में तैरता हुआ दिखाई ना देने वाला एक कण. अब अंदाजा कीजिये मनुष्य तुच्छ है के नहीं.



परन्तु एक कण का भी महत्त्व होता है. एक कण विस्थापित होने से भी कुछ तो परिवर्तन आ ही जाता है भले ही वो आँखों से ना दिखे.



हर मनुष्य, हर जीव, हर छोटी से छोटी चीज़ का भी अपना महत्त्व है. कभी भी अपने आप को तुच्छ मान कर निराश मत हुआ कीजिये.



इस तुच्छ मनुष्य ने ऐसे परमाणु हथियार बना लिए हैं के जिनसे वो ब्रह्माण्ड में ही परिवर्तन ला सकता है और पास के सभी गृहो को मिटा भी सकता है.



राजा आर्थर और डायन King Arthur Aur Dayan



युवा राजा आर्थर को पड़ोसी राज्य के एक राजा ने आक्रमण के दौरान बंदी बना लिया था. वो पडोसी राजा वैसे तो किंग आर्थर को मार देता, परन्तु वो युवा आर्थर के आदर्शों और उम्र से प्रभावित हो गया.



पड़ोसी राजा ने राजा आर्थर से कहा, "तुमको अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए मेरे एक कठिन प्रश्न का उत्तर देना होगा."



राजा आर्थर को उस प्रश्न का उत्तर देने के लिए एक वर्ष का समय दिया गया, परन्तु यदि एक वर्ष में उत्तर नहीं दिया गया तो राजा आर्थर को मृत्यु दंड का प्रावधान था.


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