Excerpt for बच्चों की दुनिया: ज्ञानवर्धक कहानियां (5) by , available in its entirety at Smashwords

बच्चों की दुनिया: ज्ञानवर्धक कहानियां (5)

Raja Sharma

www.smashwords.com



Copyright



बच्चों की दुनिया: ज्ञानवर्धक कहानियां (5)

Raja Sharma

Copyright@2017 Raja Sharma

Smashwords Edition

All rights reserved



बच्चों की दुनिया: ज्ञानवर्धक कहानियां (5)

Copyright

दो शब्द

जो देंगे वो आएगा

आसान मत बनाइये

अच्छे काम

प्रतिध्वनि

माँ चाहे तो

सोचिये और निर्णय करिये

हमारी कमियां

समस्या आप हैं

थोड़ा सा सहयोग

यही है प्यार

बुरा करो बुरा भोगो

गरीब को उठाइये

माँ बाप देते ही हैं

वो सुन्दर क्षण

गुरु तो आखिर गुरु ही रहता है

निस्वार्थ भाव

गुप्त दान

शरीर की सुंदरता



दो शब्द



अगर आप एक विचारशील अभिभावक हैं तो आप अपने बच्चों को अवश्य ही सुन्दर सुन्दर ज्ञानवर्धक कहानियां सुनाना चाहेंगे. इस पुस्तक में प्रस्तुत की गयी कहानियां बच्चों के ज्ञान में वृद्धि करने के साथ साथ उनका बहुत मनोरंजन भी करेंगी.



इस श्रंखला की ये पांचवी पुस्तक है. कुछ समय के बाद इस श्रंखला का छठा भाग भी प्रकाशित होने वाला है. आप देश विदेश जहां भी हों अपनी भाषा से जुड़े रहने का ये एक सुन्दर साधन है. आप इस पुस्तक को अपने कम्प्यूटर, आईपैड, टैबलेट, या मोबाईल पर डाउनलोड करके आसानी से पढ़ सकते हैं.



शुबकामनाएं



राजा शर्मा



जो देंगे वो आएगा



एक गांव में रमन नाम का लड़का अपने गरीब माता पिता के साथ रहता था. वो सुबह सुबह पास के जंगल में लकड़ियां इकठ्ठा करने चला जाता था और शाम को उन लकड़ियों को शहर में लेजाकर बेच देता था. इस तरह वो अपने गरीब परिवार का पालन पोषण करता था.



एक शाम वो अँधेरा होने से पहले जंगल से घर की तरफ आ रहा था. लकड़ियों का गट्ठर उसके सर पर रखा हुआ था और वो धीरे धीरे चल रहा था.



एक स्थान पर उसने एक बूढ़े व्यक्ति को देखा. वो जमीन पर लेटI हुआ था और भूख से मर रहा था. रमन उसकी मदद करना चाहता था पर उसके पास खाना तो था ही नहीं.



उसको बहुत दया आयी पर वो आगे बढ़ गया. सर पर लकड़ियों का गट्ठर होते हुए भी वो मुड़ मुड़ कर उस बूढ़े को देखता जाता था.



कुछ ही क्षणों के बाद, उसने एक स्थान पर एक पेड़ के नीचे एक हिरन को बैठे पाया. उस हिरन को बहुत प्यास लगी थी पर रमन चाहते हुए भी कुछ नहीं कर सकता था क्योंकि उसके पास पानी तो था ही नहीं. उसने दया पूर्वक हिरन को देखा और आगे बढ़ गया.



कुछ दूरी पर ही उसने एक आदमी को देखा. वो जंगल में कुछ दिन बिताने के लिए आया था और उसने अपना कैम्प गाड़ दिया था पर उसके पास जलIने के लिए लकड़ियां नहीं थी. रमन ने उसको कुछ लकड़ियां दे दी..



उस व्यक्ति ने रमन को लकड़ियों के बदले कुछ खाना और एक बोतल पानी दे दिया. रमन की ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं था.



उसने लकड़ियों का गट्ठर उस व्यक्ति के कैम्प के पास रख दिया और दौड़ कर उस भूखे बूढ़े व्यक्ति के पास गया. रमन ने उसको कुछ खाना दे दिया.



फिर रमन दौड़ कर उस प्यासे हिरन के पास गया और हिरन को पानी पिला दिया. हिरन कुलांचे भरते हुए ख़ुशी ख़ुशी जंगल की तरफ भाग चला.



रमन कैम्प की तरफ फिर आया और अपनी लकड़ियों का गट्ठर लेकर अपने गाँव की और चल दिया.



दुर्भाग्यवश कुछ दिनों के बाद रमन अचानक एक पहाड़ी से नीचे गिर गया और उठ ना सका. उसको बहुत दर्द हो रहा था. अचानक ही वो भूखा बूढा प्रकट हुआ और रमन को खाई में से बाहर निकाल लिया. रमन के पैरों में बहुत से घाव हो गए थे.



ठीक उसी समय वो हिरन भी वहां आ गया. रमन ने एक दिन उस हिरन को पानी पिलाया था. वो हिरन दौड़ कर जंगल में गया और कुछ देर बाद अपने मुहं में कुछ जड़ी बूटियां लेकर आ गया. बूढ़े ने वो बूटियां पत्थर पर पीसकर रमन के घावों पर लगा दी.



कुछ ही समय में रमन का दर्द बिलकुल गायब हो गया और वो उठ कर खड़ा हो गया. रमन हिरन और वो बूढा बहुत ही खुश लग रहे थे के एक दुसरे का सहयोग करने में कितना सुख मिलता है.



मित्रों,



कथा तो बहुत ही छोटी सी है पर बहुत ही सुख का आभास कराती है. यदि हम औरों की मदद करते हैं तो निश्चय ही वो लोग भी हमारी मदद करेंगे.



आपके दया और दान आपके पास जरूर वापिस आ जाते हैं, हालाँकि वो विभिन्न रूपों में आते हैं.



आसान मत बनाइये



एक छोटे से शहर में दो पडोसी रहते थे. उन दोनों के घर साथ साथ थे. उनमे से एक अवकाशप्राप्त शिक्षक था और दूसरा बीमा एजेंट था. बीमा एजेंट की रूचि विज्ञान और तकनीक में थी.



उन दोनों पड़ोसियों के घरों के पीछे उनके बगीचे थे. उन दोनों ने ही अपने अपने बगीचे में विभिन्न पौधे और पेड़ लगा रखे थे.



अवकाशप्राप्त शिक्षक अपने पेड़ पौधों पर अधिक ध्यान नहीं देता था. वो उनको थोड़ा ही पानी दिया करता था, पर बीमा एजेंट बहुत पानी डालता था और अपने पौधों पर बहुत अधिक ध्यान देता था.



अवकाशप्राप्त शिक्षक के पौधे साधारण थे पर वो सुन्दर थे. बीमा एजेंट के पौधे बहुत हरेभरे थे.



एक रात बहुत तेज बरसात हुई और बहुत तेज हवाएं चली. वो एक तूफ़ान जैसा ही था. अगली सुबह, दोनों पडोसी बाहर आये और अपने अपने बगीचे का निरीक्षण करने गए.



बीमा एजेंट के बहुत से पौधे तो जड़ से ही उखड गए थे और उसके पूरे बगीचे को बहुत अधिक क्षति हुई थी. इसके विपरीत, अवकाशप्राप्त शिक्षक के पौधों को कोई भी क्षति नहीं हुई थी और सभी पौधे बिलकुल सीधे खड़े थे और लहलहा रहे थे.



उस बीमा एजेंट को आश्चर्य हुआ के शिक्षक के पौधों को कोई भी क्षति नहीं हुई थी.



वो शिक्षक के पास गया और कहा, "हम दोनों ने साथ साथ ही पौधे लगाए थे और मैंने अपने पौधों पर तुमसे ज्यादा ध्यान भी दिया था और ज्यादा पानी भी दिया था, पर मेरे पौधे उखड गए हैं और तुम्हारे पौधे बिलकुल ठीक हैं. ऐसा कैसे हो गया?"



अवकाशप्राप्त शिक्षक ने मुस्कुराते हुए कहा, "तुमने अपने पौधों पर ज्यादा ध्यान दिया और पानी भी अधिक दिया, और उन पौधों को जरूरत से ज्यादा देकर तुमने उनको स्वयं कुछ भी करने से रोक दिया.



तुमने उन पौधों के लिए सब आसान बना दिया और उनको कुछ भी नहीं करना पड़ा. मैं अपने पौधों को थोड़ा पानी देता था और मेरे पौधों की जड़ों को पानी तक पहुँचने या पानी खोजने के लिए मेहनत करनी पड़ती थी और वो जड़ें ताकतवर होती चली गयी.



और इस कारण से मेरे पौधों की जड़ें जमीन में बहुत अंदर तक चली गयी और तुम्हारे पौधों को बहुत पानी मिलने के कारण उनकी जड़ों को मेहनत नहीं करनी पड़ी और वो कमजोर रह गए और तूफ़ान में उखड गए."



मित्रों,



ये कथा वास्तव में बच्चों का पालन पोषण करने वाले अभिभावकों के लिए है. हमारे बच्चे भी पौधों की तरह ही होते हैं. यदि हम अपने बगीचे के पौधों को जरूरत से ज्यादा देते हैं तो वो आलसी और कमजोर हो जाते हैं और उनको मेहनत नहीं करनी पड़ती है.



उन पौधों को मेहनत का अर्थ ही ज्ञात नहीं होता और वो अंदर ही अंदर कमजोर होते जाते हैं. इसी तरह बच्चों को सभी कुछ आसानी से दे देने से वो आप पर आश्रित हो जाते हैं और बिलकुल भी मेहनत नहीं करते हैं. उनको देने की जगह निर्देशित करेंगे तो बहुत ही अच्छा होगा.



अच्छे काम



भगवान् कृष्ण समय समय पर अर्जुन को बहुमूल्य पाठ सिखाते रहते थे. एक दिन, वो दोनों शहर में घूम रहे थे. एक स्थान पर एक भिक्षु भीख मांग रहा था.



अर्जुन को उस भिक्षु को देखकर बहुत दुःख हुआ और अर्जुन ने उसको सोने के एक सौ सिक्के दे दिए. वो भिक्षु बहुत ही प्रसन्न हुआ और उसने अर्जुन को दिल से धन्यवाद किया.



भिक्षु ख़ुशी ख़ुशी अपने घर की तरफ चलने लगा. रास्ते में उसको एक और व्यक्ति मिला. उस व्यक्ति को भी सहयोग की आवश्यकता थी.



भिक्षु चाहता तो उसको कुछ सोने के सिक्के दे कर उसको सहयोग कर सकता था पर उसने ऐसा नहीं किया.



जब वो अपने गाँव के पास था, एक लुटेरे ने उसके सोने के सिक्के लूट लिए और भाग गया. भिक्षु सिर्फ हाथ मलता रह गया.



अगले दिन वो भिक्षु फिर से उसी जगह पहुंचकर भीख मांगने लगा. अर्जुन उसको देख कर चकित हुआ क्योंकि अर्जुन ने सोचा था के एक सौ सोने के सिक्के तो उसके पूरे जीवन के लिए पर्याप्त थे, पर वो फिर से भीख मांग रहा था.



अर्जुन ने उस भिक्षु से फिर से भीख मांगने का कारण पुछा. भिक्षु ने पूरी कथा कह सुनाई. अर्जुन को उसपर दया आ गयी. उसने उस भिक्षु को एक हीरा भीख में दे दिया.



भिक्षु फिर से घर की तरफ चल दिया. रास्ते में उसको फिर से एक व्यक्ति दिखा जिसको सहयोग की जरूरत थी, पर भिक्षु ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया और अपने रास्ते पर चलता रहा.



घर पहुंचकर उसने वो हीरा एक मिटटी के खाली घड़े में रख दिया. उसका विचार था के वो अगले दिन उसको बाजार में बेच कर बहुत से पैसे प्राप्त कर लेगा और धनि हो जाएगा. उस समय उसकी पत्नी घर पर नहीं थी.



भिक्षु बहुत थका हुआ था इसलिए उसने कुछ देर विश्राम करने का निर्णय कलिया. कुछ ही देर में सो गया. जब उसकी पत्नी घर आयी तो उसने देखा के घर में पानी नहीं था. उसने घड़ा उठाया और नदी की तरफ चल दी.



भिक्षु की पत्नी ने नहीं देखा के उस घड़े में हीरा रखा हुआ था. उसने नदी से पानी भरा पर पानी भरते समय वो हीरा नदी के पानी की धार में बह गया. घड़े को पानी से भरकर वो घर वापिस आ गयी.



जब भिक्षु की आँख खुली वो तुरंत उठकर घड़े की तरफ गया पर वो घड़ा तो पानी से भरा हुआ था. उसने पानी में हाथ डालकर देखा पर उसका हीरा वहाँ नहीं था. उसने अपनी पत्नी से पुछा पर उसको भी कुछ मालुम नहीं था.



भिक्षु को अपने दुर्भाग्य पर विशवास नहीं हुआ. अगले दिन वो फिर से भीख मांगने पहुँच गया. अर्जुन और भगवान् कृष्ण ने उसको भीख मांगते हुए देखा.



अर्जुन ने उस भिक्षु से फिर से कारण पुछा. अर्जुन को बहुत दुःख हुआ और वो सोचने लगा के क्या वो भिखारी कभी सुखी हो सकेगा.



भगवान् कृष्ण ने मुस्कुराते हुए उस भिक्षु को एक सिक्का दिया. उस पैसे में तो वो भिक्षु एक समय का भोजन भी नहीं खरीद सकता था.



अर्जुन को आश्चर्य हुआ और उसने कृष्ण से कहा, "मैंने उसको सोने के सिक्के और हीरा दिए जिनसे वो धनि जीवन बिता सकता था, पर आपका एक सिक्का उसको कैसे सहयोग करेगा?"



कृष्ण ने मुस्कुराते हुए अर्जुन से उनके पीछे पीछे आने को कहा. वो दोनों भिक्षु के पीछे पीछे चलने लगे. भिक्षु सोच रहा था के उस एक सिक्के से तो वो पेट भर भोजन भी नहीं खरीद सकता था.



रास्ते में उसने एक मछेरे को देखा. उसके जाल में एक छोटी मछली फँसी थी और वो छटपटा रही थी. भिक्षु ने सोचा क्यों ना उस मछली की जान बचा ली जाए.



उसने वो सिक्का मछेरे को दे दिया और उस मछली को लेकर एक बर्तन में पानी भरकर उसमे रख लिया और घर आ गया.



उस छोटे से बर्तन में मछली को घुटन सी महसूस होने लगी. अचानक उसने वो हीरा अपने मुहं से बाहर फेंक दिया. भिक्षु ये देख कर ख़ुशी से नाचने लगा, "मेरा हीरा, मेरा हीरा!"



भिक्षु घर से बाहर आ गया. कुछ ही दूरी पर वो लुटेरा जा रहा था. उस लुटेरे ने भिक्षु के एक सौ सिक्के लुटे थे. उसने सोचा के भिक्षु ने उसको पहचान लिया है और वो लोगों को बुलाकर उसको पकड़ लेगा और फिर उसको राजा से सजा दिलवाएगा.


Purchase this book or download sample versions for your ebook reader.
(Pages 1-15 show above.)