Excerpt for बच्चों की दुनिया: ज्ञानवर्धक कहानियां (3) by , available in its entirety at Smashwords

बच्चों की दुनिया: ज्ञानवर्धक कहानियां (3)

Raja Sharma

www.smashwords.com



Copyright



बच्चों की दुनिया: ज्ञानवर्धक कहानियां (3)

Raja Sharma

Copyright@2017 Raja Sharma

Smashwords Edition

All rights reserved





बच्चों की दुनिया: ज्ञानवर्धक कहानियां (3)

Copyright

दो शब्द

दूसरों से तुलना

मन में शक्तियां

मेरे तीन गुरु

शोक सन्देश

तात्कालिक सुन्दरता

पैसा और प्रसन्नता

व्यवहार और प्रमाणपत्र

गुरु का स्थान

कभी बंद कभी खुली

समाधान

राजधर्म

समस्याएं हैं तो समाधान हैं

सच्चाई

सामना करिये

टैक्सी वाला

परिश्रमी पिता

उनको भी कुछ समय दीजिये

धन कोई गुण नहीं

इज़्ज़त कमाई जाती है

मैं आशा हूँ



दो शब्द



अगर आप एक विचारशील अभिभावक हैं तो आप अपने बच्चों को अवश्य ही सुन्दर सुन्दर ज्ञानवर्धक कहानियां सुनाना चाहेंगे. इस पुस्तक में प्रस्तुत की गयी कहानियां बच्चों के ज्ञान में वृद्धि करने के साथ साथ उनका बहुत मनोरंजन भी करेंगी.



इस श्रंखला की ये तीसरी पुस्तक है. कुछ समय के बाद इस श्रंखला का चौथा भाग भी प्रकाशित होने वाला है. आप देश विदेश जहां भी हों अपनी भाषा से जुड़े रहने का ये एक सुन्दर साधन है. आप इस पुस्तक को अपने कम्प्यूटर, आईपैड, टैबलेट, या मोबाईल पर डाउनलोड करके आसानी से पढ़ सकते हैं.



शुबकामनाएं



राजा शर्मा



दूसरों से तुलना



एक जंगल में एक कौवा रहता था. उसके जीवन में सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था. उसने कभी भी दूसरे पक्षी नहीं देखे थे.



एक दिन उसने एक हंस देखा. वो उस हंस के सफ़ेद रंग से बहुत प्रभावित किया. उसको वो हंस बहुत ही सुन्दर लगा. उसने अपने मन में सोचा के हंस ही सबसे सुन्दर और सुखी पक्षी है. उसको अपने काले रंग से घृणा होने लगी.



जब उससे सहन नहीं हुए तो उसने हंस से बात करके अपने मन की बात बताने का निर्णय लिया. उसने हंस के सफ़ेद रंग और उसकी सुंदरता की प्रशंसा की और अपने मन की बात उस हंस को बता दी.



पूरी बात सुनने के बाद, उस हंस ने कौवे से कहा, "मित्र, ऐसा बिलकुल नहीं है. पहले मैं भी अपने आप को और सभी पक्षियों से सुखी मानता था, पर एक दिन जब मैंने एक तोते को देखा तो मुझे लगा के मैं गलत था.



तोते का सुन्दर हरा रंग और मीठी बोली ने मुझे बहुत प्रभावित किया. उस दिन मैंने सोच लिया के तोता ही सबसे सुन्दर और सुखी होता है."



कौवा तो असमंजस में पड़ गया क्योंकि उसने तो हंस को ही सबसे सुन्दर और सुखी मान लिया था. फिर भी उसने तोते को खोजने का निर्णय लिया.



इधर उधर उड़ने और खोजने के बाद उसको तोता मिल ही गया. उसके हरे रंग और मीठी आवाज ने कौवे को बहुत ही प्रभावित किया. उसने तोते की प्रशंसा की और अपने मन की बात उस तोते को भी बता दी.



तोते ने कुछ सोचते हुए कहा, "मैं भी बहुत ही सुखी जीवन बिता रहा था, परन्तु एक दिन मैंने एक मोर को देखा और मैं चकित हो गया. मोर के तो बहुत से रंग थे और उसके फैले हुए पंख मुझे सबसे सुन्दर लगे. मुझे लगा के मोर ही सबसे सुन्दर और सुखी था."



कौवे ने मोर को देखने का निर्णय किया. उसने इधर उधर बहुत खोजा पर उसको मोर नहीं मिला. अंत में वो एक चिड़ियाघर में जा पहुंचा. उसको मोर मिल गया. बहुत से लोग उस मोर को देख रहे थे और उसकी प्रशंसा कर रहे थे.



जब लोग वहां से चले गए तो कौवे ने पास आकर मोर से कहा, "मित्र, तुम तो बहुत ही भाग्यशाली हो. तुम इतने सुन्दर हो और इतने लोग तुमको देखने के लिए आते हैं, जबकि मुझे तो ये लोग देखते ही उड़ा देते हैं और पत्थर फेंकते हैं"



मोर ने उदास होते हुए कहा, "मेरे मित्र, मैं भी सोचता था के मैं सबसे सुन्दर पक्षी हूँ, पर मेरे लिए मेरी सुंदरता ही अभिश्राप बन गयी है. देखो आज मुझको इस चिड़ियाघर में बंद कर के रखा है.



मैंने सभी प्राणियों को देखा है और मुझे सिर्फ कौवा ही एक ऐसा पक्षी लगा जिसको कोई पकड़ता नहीं है और पिंजरे में बंद नहीं करता है. तुम ही सबसे भाग्यशाली हो. तुम स्वतंत्रतापूर्वक जिधर चाहो उड़कर जा सकते हो. काश मैं भी कौवा होता!"



मित्रों,



हर चीज़ के और हर प्राणी के कुछ गुण और कुछ अवगुण होते ही हैं. इसी तरह हर मनुष्य में अपने विशेष गुण और अवगुण होते हैं, परन्तु हम हमेशा औरों से अपनी तुलना करते रहते हैं और निराश हो जाते हैं.



यदि हमारे पास जो कुछ भी है उसकी कदर करना हम सीख लिए तो हमारा जीवन सुखी बन सकता है, परन्तु हम औरों के पास क्या है बस उसको ही देखते रहते हैं और खुद को छोटा मानते रहते हैं.



आप अपने आप में विशेष हैं और अद्वितीय हैं. किसी से भी अपनी तुलना मत कीजिये बस जो कुछ भी आपको मिला हुआ है उसको ही लेकर परिश्रम करते रहिये और आगे बढिये और जीवन का आनंद लीजिये.



मन में शक्तियां



स्वर्ग में एक बार सभी देवता एक गंभीर चर्चा कर रहे थे. वो चर्चा उन शक्तियों के बारे में थी जो शक्तियां मनुष्य की मनोकामनाएं पूरी करती हैं. देवता उन गुप्त शक्तियों को कहीं छुपाना चाहते थे. बहुत देर तक वाद विवाद होता रहा.



एक देवता ने कहा, "हमें इन शक्तियों को किसी जंगल में छुपा देना चाहिए."



तभी दूसरे देवता ने उसको रोका और कहा, "नहीं, इन शक्तियों को किसी पर्वत की चोटी पर छुपा कर रखना चाहिए."



अचानक तीसरे देवता ने उन दोनों को रोका और कहा, "हम इन शक्तियों को समुद्र की गहराइयों में छुपा देंगे क्योंकि वहां तक मनुष्य नहीं पहुँच सकेगा."



अंत में एक वृद्ध देवता ने मुस्कुराते हुए कहा, "नहीं इन शक्तियों को हम मनुष्य के मन में ही छुपा देंगे क्योंकि मनुष्य का मन उसके बचपन से ही इधर उधर भटकता रहता है. मनुष्य कभी सोच भी नहीं सकेगा के इतनी चमत्कारी शक्तियां उसके मन में छिपी हैं."



सभी देवताओं को ये विचार बहुत पसंद आया क्योंकि उनको पता था के मनुष्य कभी भी अपने मन के अंदर नहीं झांकता है, वो बाहर ही खोजता रहता है.



देवताओं ने सभी शक्तियां मनुष्य के मन में छिपा दी. आज भी कहते हैं ना के मनुष्य चाहे तो अपने मन की शक्तियों से कुछ भी कर सकता है.



मित्रों,



इच्छा शक्ति या मन की शक्ति से मनुष्य चाहे तो कुछ भी कर सकता है, परन्तु वो अपने मन पर नियंत्रण ना करके इधर उधर भटकता रहता है.



मनुष्य के लिए ये बात सार्थक होती है "कस्तूरी कुण्डल बसे मृग ढूंढे बन माय.' अर्थात कस्तूरी तो मृग के अंदर ही होती है और हिरन उसकी खुशबु का पीछा वन में इधर उधर भटक कर करता रहता है.



ऐसे ही सभी शक्तियां मनुष्य के अंदर होती हैं. प्रभु, परमात्मा, या सृष्टि व प्रकृति भी मनुष्य के अंदर ही होती है पर मनुष्य बाहर खोजता रहता है और इधर उधर मंदिरों, मस्जिदों, गुरद्वारों, और गिरजाघरों में ढूंढ़ता फिरता है.



अपने अंदर के प्रभु या शक्तियों को पहचानिये और जीवन में जो चाहिए प्राप्त कीजिये.



मेरे तीन गुरु



एक गाँव में एक महापुरुष रहते थे. उनके आश्रम में उनके साथ बहुत से शिष्य रहते थे. गुरु जी सभी शिष्यों को विभिन्न विषय पढ़ाते थे और उनको बहुत सी जानकारियां भी देते थे.



एक दिन उनके एक शिष्य ने कहा, "गुरु जी, आप हमारे गुरु हैं, पर मुझे ये जानने की उत्सुकता है के आपके गुरु कौन थे."



गुरु जी ने मुस्कुरा कर कहा, "पुत्र, मेरे तो हज़ारों गुरु हैं और उन सबको गिनना या उनके बारे में बताने में तो शायद कई दिन लग जाएंगे, परन्तु मैं तुमको अपने तीन गुरुओं के बारे में बताता हूँ."



गुरु जी के सभी शिष्य उनके सामने जमीन पर बैठ गए और गुरु जी ने बोलना शुरू कर दिया, "मेरा पहला गुरु एक चोर था. एक बार एक जंगल में रात हो गयी और मैं रास्ता भटक कर एक नए गाँव में पहुँच गया.



सब लोग घरों के अंदर सो चुके थे. अचानक मैंने एक आदमी को देखा. वो एक घर की एक दीवार में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा था.



मैंने उसको कहा, "मित्र, मैं रास्ता भटक गया हूँ. मुझे कहीं रात गुजारने के लिए जगह मिल जाएगी?"



उसने कहा, "अभी तो बहुत मुश्किल है क्योंकि सभी लोग सो चुके हैं, परन्तु मैं कुछ कर सकता हूँ. मैं एक चोर हूँ, पर अगर आप चाहें तो आप मेरे साथ मेरे घर में रह सकते हैं. परन्तु यदि मेरे चोर होने पर आपको कोई आपत्ति है तो मैं कुछ नहीं कर सकता."



सभी शिष्य बहुत ही ध्यान से गुरु जी की कहानी सुन रहे थे. गुरु जी ने कहा, "वो चोर एक बहुत ही प्यारा इंसान था. मैंने उसके घर में एक महीना बिताया. रात को वो अपने काम पर चला जाता था और मुझको सोने के लिए कह जाता था.



उसके वापिस आने के बाद मैं उसको पूछा करता था के क्या वो कुछ चोरी कर पाया था. कई दिन बीत गए पर वो सफल नहीं हुआ. हर दिन वो कहता था के अगर प्रभु ने चाहा तो जल्दी ही वो कुछ चोरी करने में सफल हो जाएगा.



वो कई रातों तक असफल होता रहा पर वो कभी भी निराश या उदास नहीं होता था. उस घटना को कई वर्ष बीत गए. मैं कभी कभी निराश या उदास हो जाता था तो मैं उस चोर को याद कर लिया करता था.



कभी कभी मैं अपनी समाधी साधना सब छोड़ देने के बारे में सोचा करता था, परन्तु जैसे ही मैं उस चोर को याद करता मुझमे साहस और ऊर्जा का संचार हो जाता था. मुझे चोर की बात याद आती थी के प्रभु ने चाहा तो जल्दी ही कुछ मिलेगा."



गुरु जी के शिष्य मुग्ध होकर अपने गुरु जी की बातों को सुन रहे थे. गुरु जी ने फिर कहना शुरू किया, "मेरा दूसरा गुरु एक कुत्ता था. एक दिन बहुत गर्मी थी. मुझे बहुत प्यास लगी थी. मुझे कहीं भी पानी नहीं मिल रहा था.



मैं पानी की तलाश में इधर उधर घूम रहा था तभी एक कुत्ता दौड़ता हुआ आया। वह भी प्यासा था। पास ही एक नदी थी। उस कुत्ते ने आगे जाकर नदी में झांका तो उसे एक और कुत्ता पानी में नजर आया जो कि उसकी अपनी परछाई थी।



कुत्ता उसे देख बहुत डर गया। वह परछाई को देखकर भौकता और पीछे हट जाता, लेकिन बहुत प्यास लगने के कारण वह वापस पानी के पास लौट आता। अंततः, अपने डर के बावजूद वह नदी में कूद पड़ा और उसके कूदते ही वह परछाई भी गायब हो गई।



उस कुत्ते के इस साहस को देख मुझे एक बहुत बड़ी सीख मिल गई। अपने डर के बावजूद व्यक्ति को छलांग लगा लेनी होती है। सफलता उसे ही मिलती है जो व्यक्ति डर का साहस से मुकाबला करता है।



गुरु जी कुछ देर के लिए रुके और पानी पीकर उन्होंने फिर से बोलना शुरू किया, "मेरा तीसरा गुरु एक छोटा सा बच्चा है. एक दिन मैं कहीं जा रहा था. रास्ते में एक गाँव पड़ता था.



जब मैं उस गाँव से गुज़र रहा था मैंने एक छोटे से बच्चे को देखा. वो छोटा सा बच्चा एक जलती हुई मोमबत्ती ले जा रहा था। वह पास के किसी गिरजाघर में मोमबत्ती रखने जा रहा था। मजाक में ही मैंने उससे पूछा कि क्या यह मोमबत्ती तुमने जलाई है ?



उस बच्चे ने जवाब दिया, "जी हाँ, ये मैंने ही जलाई है."



मैंने उस बच्चे को कहा, "एक क्षण था जब यह मोमबत्ती बुझी हुई थी और फिर एक क्षण आया जब यह मोमबत्ती जल गई। क्या तुम मुझे वह स्रोत दिखा सकते हो जहा से वह ज्योति आई ?"



वह बच्चा हँसा और मोमबत्ती को फूंक मारकर बुझाते हुए बोला, "अब आपने ज्योति को जाते हुए देखा है। कहा गई वह ? आप ही मुझे बताइए। “



गुरु जी ने कहा, “मेरा अहंकार चकनाचूर हो गया, मेरा ज्ञान जाता रहा। और उस क्षण मुझे अपनी ही मूढ़ता का एहसास हुआ। तब से मैंने कोरे ज्ञान से हाथ धो लिए। “



मित्रों,



जीवन तो एक प्रक्रिया है और जीवन के हर क्षण ही हम कुछ न कुछ सीखते रहते हैं. जो लोग किसी एक व्यक्ति को अपना गुरु या अपना आराध्य मान लेते हैं वो बहुत ही संकीर्ण विचारों वाले बन जाते हैं..



किस एक बात में ही रुक जाने का मतलब होता है उसके आगे कुछ नहीं ही. हर गुरु से हम कुछ ना कुछ सीख सकते हैं और यहाँ तक के कोई भी व्यक्ति कुछ ना कुछ तो सिखा ही सकता है.



मनुष्य को जहां से हो सके सीखते रहना चाहिए. किसी एक विचारधारा, किसी एक गुरु, या किसी एक सिद्धांत पर रुक जाने से विकास के रास्ते बंद हो सकते हैं. जहां से जो भी कुछ अच्छा मिलता हो लेते चलिए.



शोक सन्देश



१८८८ की एक सुबह अखबार पढ़ते समय, एक व्यक्ति एक शोक सन्देश पढ़कर हैरान हो गया. वो शोक सन्देश उसकी अपनी मृत्यु के बारे में था. शोक सन्देश में उसका नाम लिखा हुआ था और उसको मृत घोषित कर दिया गया था.



वो व्यक्ति चकित होने की साथ ही बहुत भयभीत हो गया. वास्तव में उसके मृत भाई की मृत्यु की खबर छपनी चाहिए थी पर गलती से उसकी मृत्यु की खबर छप गयी थी.



कुछ देर सोचने के बाद उसने अपने आप को नियंत्रित किया और उसने घर से बाहर जाकर लोगों की प्रतिक्रिया जानने का निर्णय लिया.


Purchase this book or download sample versions for your ebook reader.
(Pages 1-17 show above.)