Excerpt for क्या करें by , available in its entirety at Smashwords

By Santosh Jha

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Copyright 2017 Santosh Jha

Smashwords Edition

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प्रस्तावना

सच मानिये, किस्से-कहानी जैसी कोई चीज होती नहीं। जब सच के अल्हदा टुकड़ों को जोड़ दीजिये, तो कहानी होती है। कुछ हुआ होता है, और फिर उससे थोड़ा इतर, जैसा ‘होना’ हम चाहते रहते हैं, वैसा कह डालिये, तो कहानी होती है। यूं ही, दिल भर आये, शब्द बेसम्हार हो जायें, तो कहानी होती है। कभी, पता नहीं किस मिजाज में, बेसबब ही, दामन छोटा पड़ जाये, तो कहानी होती है। यह कहानी, जो आप अब अपने बच्चों को पढ़ कर सुनानें वाले हैं, वह तो कहानी भी नहीं है। सौ टके ईमानदारी से कहूं, तो यह लम्हों का शुक्राना है। उन पलों को ‘थैंक्यू’ कह सकने की नाकामयाब सी जुगत है, जब ‘वे’ आये। तभी तो मां-बाप, दादा-दादी, नाना-नानी हुए... फिर, कहानियों को तो आना ही था!

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बोजो बहुत परेशान था। उसकी समझ में बिलकुल नहीं आ रहा था कि क्या करें। आखिर बोजो था भी तो बस तीन महीने का, छोटा सा, बेवकूफ सा दिखने वाला, मगर समझदार डागी। समस्या भी ऐसी थी कि उसका तो दिमाग ही काम नहीं कर रहा था। अपने मन की बात कहे भी तो किससे कहे। बोजो की जो दोस्त थी, तीन साल की बबली, वह भी तो स्कूल गई थी। क्या करें, बहुत परेशानी थी...!

कोई कुछ करे भी तो क्या, छोटे से लोगों की परेशानी भी हमेशा बड़ी ही हो जाती है। वैसे तो बड़े लोगों की भी आदत होती है अपनी-अपनी परेशानियों को बेवजह बड़ा करने की। लेकिन बोजो की समस्या तो वास्तव में बहुत बड़ी थी। घर में बोजों के अलावा उसकी दोस्त बबली थी और उसके मम्मी और पापा। वह सब तो बाहर थे। पापा और मम्मी को आफिस जाना होता था और बबली भी स्कूल जाती थी। इतने बड़े घर में नन्हा सा बोजो बेचारा अकेला। उस पर से यह आफत ना जाने कहां से आ टपकी।

बोजो अपना नाश्ता कर के चुपचाप सोने की कोशिश कर रहा था कि उसे बालकनी में कुछ फड़फड़ाहट सी सुनाई दी। फिर कांव-कांव की घरघराती हुई आवाज आई। बोजो तो पहले डर गया, उसने अपनी जिंदगी में पहली बार ऐसी आवाज सुनी थी। कांव-कांव तो कौवे करते हैं, यह तो उसे पता था मगर, यह तो कुछ अलग सा था। ऐसे जैसे कोई कराह रहा हो।

बोजो ने हिम्मत जुटाई, करनी ही पड़ती है, घर में अकेले रहने वाले को हिम्मत रखना ही पड़ती है। फिर, बोजो तो कुत्ता था। उसका तो काम ही था घर की रखवाली करना। तो बोजो ने छिप कर, बेहद सावधानी से दरवाजा खोल कर, बालकनी में झांक कर देखा तो हैरान रह गया। एक कौवे का छोटा सा बच्चा अपनी गुलाबी सी चोंच खोले कांव-कांव कर रहा था। वह पंख फड़फड़ता, मगर उड़ नहीं पा रहा था।

बोजो ने खुद से कहा, ‘यह बेवकूफ यहां क्या कर रहा है? यहां आया कैसे?’

बोजो ने नजदीक जा कर देखा तो पता चला कि कौवे का बच्चा थोड़ा घायल भी था। उसकी पीठ पर खून के निशान भी थे। बोजो ने देखा कि एक चील उपर मंडरा रहा था। बोजो था तो छोटा मगर बेहद समझदार। उसकी समझ में आ गया कि चील बच्चे को उसके घोंसले से उठाकर ले जा रहा होगा और हड़बड़ाहट में कौवे का बच्चा उसके पंजों से छूट कर बालकनी में गिर गया होगा।

बोजो ने तुरंत अपना दिमाग लगाया। कौवे के बच्चे को कमरे के अंदर ले आया ताकि चील उसे फिर से ना पकड़ सके। बोजो ने उसे एक मुलायम कपड़े से लपेटा और पानी पिलाया। अपने ही खाने में से उसे खिलाया। कौवे के बच्चे ने उसे थैंक्यू कहा। आखिर बोजो ने उसकी जान बचाई थी। कोई आपकी मदद करे तो थैंक्यू कहना ही पड़ता है। कौवे के बच्चे को उसकी मां ने जरूर ही यह सिखाया होगा।

यह सब तो ठीक था मगर बोजो की चिंता इस बात से थी कि शाम में जब बबली के मम्मी-पापा आयेंगे तो फिर वह कौवे के बच्चे को देख कर बोजो पर बहुत गुस्सा करेंगे। हालांकि कौवे के बच्चे ने पूछने पर अपना नाम चंदू बताया था मगर था तो वह कोयले से भी काला। और बेवकूफ बोलता भी था कितना कड़वा - ‘कांव-कांव’। उस पर से बबली के नाना-नानी भी तो अगली सुबह आने वाले थे। बोजो को हमेशा से ही बबली की नानी से बहुत डर लगता था।

अच्छी बात यह थी कि नन्ही बबली बोजो की अच्छी दोस्त थी। बोजो को घर लाई भी तो बबली ही थी। दूसरी अच्छी बात यह थी कि बबली स्कूल से चार बजे ही आ जाती थी और उसके मम्मी-पापा छह बजे आते थे। बोजो को भरोसा था कि बबली उसकी परेशानी का कोई न कोई हल जरूर निकाल लेगी। बबली थी भी बहुत दिमाग वाली, ऐसा बोजो को विश्वास था, क्यूंकि जब भी वह किसी मुसीबत में होता तो बबली ही उसकी मदद करती थी। बोजो चाहता था कि चंदू उसके साथ ही रहे ताकि जब बबली और उसके मम्मी-पापा घर में ना रहें तो उसे अकेला ना रहना पड़े और वह चंदू के साथ खेले।



खैर, बबली आई और उसने पूरे मामले को ठीक से समझा। चंदू तो था ही भोला-भाला इसलिए बबली को वह पसंद भी आया। वैसे भी बबली बोजो की दोस्त थी तो उसे बोजो के मन की बात समझ में आ भी गई कि बोजो को भी तो अपने जैसा एक फ्रेंड चाहिए। बबली ने चंदू को अपनी फेवरिट बिस्कुट निकाल कर खाने को भी दिया। मगर, समझ में उसकी भी नहीं आ रहा था कि आखिर क्या जुगत लगाई जाये कि चंदू को घर में रहने की इजाजत भी मिल जाये और उसके मम्मी-पापा नाराज भी ना हों।

बबली और बोजो ने मिलकर यह फैसला किया कि किसी भी कीमत कर चंदू को वह तब तक अपनी हिफाजत में रखेंगे जब तक वह उड़ने लायक ना हो जाये। दोनों ने मिलकर चंदू को समझाया कि जब तक वह इस मसले का कोई उपाय ना ढूंढ लें, वह चुपचाप अल्मारी के उपर सोया रहे और पंख भी ना फड़फडाये। चंदू ने भी मामले की नजाकत को समझा और फिर बबली ने उसे अच्छे से उल्मारी के उपर रख दिया। ढेर सा बिस्कुट और पानी की कटोरी भी चंदू के पास ही रख दी गई।

बबली और बोजो अच्छे बच्चे थे इसलिए ही वह किसी को भी दर्द व तकलीफ में नहीं देख सकते थे मगर वह अपने मम्मी-पापा और घर के लोगों को भी परेशान नहीं करना चाहते थे। दोनो ही इसलिए बेहद खुश भी थे कि वह बेचारे चंदू की मदद कर पा रहे थे। लेकिन किसी की मदद करना भी तो आसान काम नहीं होता। हर काम को अच्छे से करने में दिमाग लगाना पड़ता है। बबली और बोजो वही तो कर रहे थे। दोनो ही सोच में थे कि क्या करें...!





मगर, उन्हे क्या पता था कि आगे क्या होने वाला है। रात तो प्लान के मुताबिक कट ही गई। मगर, सुबह सवेरे जो हुआ वह तो बबली और बोजो ने सपने में भी नहीं सोचा था...!

सुबह-सवेरे बबली के नाना-नानी आ गये। सब बहुत खुश थे। बबली के नाना ने उसके लिए ढेर सारे खिलौने और कपड़े लाये थे। बोजो के लिए भी एक नया कालर आया था। नाना ने उस दुलार भी किया। इतना सब कुछ तो ठीक ही रहा मगर कुछ देर के बाद ही नानी ने एक बड़ा सा डब्बा खोला और लो, उसमें तो बेहद लजीज मिठाईयां थीं। अरे कमाल! लड्डू, पेंड़े, बर्फी, कलाकंद, और तो और बालूशाही भी, वाह...!

हाय हाय...! क्या लाजवाब खुशबू थी, बालूशाही की। अब जो उसकी महक फैली तो दूर जा के चंदू के नाक में सीधा घुस गई। चंदू तो बेचारा मेहमानों के आने के शोर से सहमा सा चुपचाप अल्मारी के उपर पड़ा हुआ था। मगर, खुशबू सूंघ कर उसकी खुशी का ठिकाना ना रहा। उसे कुछ याद आ गया। एक बार चंदू की मां ने कहीं से बालूशाही का टुकड़ा पाया था और घोंसले में चंदू को खाने को दिया था। चंदू को घी की खुशबू याद आ गई। उसे मिठाई पसंद भी बहुत थी। लो, हो गया कबाड़ा...!

चंदू से रहा ना गया और वह यह भी भूल गया कि बबली और बोजो ने उसे चुपपाच रहने को कहा था। अल्मारी के उपर से ही चंदू जोर-जोर से कांव-कांव करने लगा - ‘मुझे भी, मुझे भी...’। इतना ही नहीं, मारे खुशी के, उत्साह व उत्तेजना में उसने अपने पंख भी फड़फड़ाने शुरु किये और वह उड़ कर धब्ब से उसी पलंग पर आ कर गिरा जिस पर नानी मिठाई का डिब्बा ले कर बैठी थीं।

लीजिये, हो गया गुड़गोबर, मच गया घमाशान। अफरातफरी मच गई। जल्दी ही बात भी खुल गई। बबली ने बड़ी हिम्मत जुटा कर अपने मन की बात बता भी दी। बोजो बहुत घबड़ा गया था, मगर वह भी अपनी दोस्त बबली के साथ खड़ा हो गया और सहमी सी आवाज में बबली के सुर में सुर मिलाने लगा।

बबली की नानी तो आगबबूला हो गयी। उन्होने साफ कह दिया, ‘यह कौवा तो घर में नहीं रह सकता। दिन भर कांव-कांव करता रहेगा तो भला कैसे कोई चैन से एक भी पल जियेगा?’

बबली के नाना तो जैसे हर वक्त इसी फिराक में रहते थे कि कैसे बबली के नानी को नापा जा सके। उन्होने और आग लगा दी। कहा, ‘कमाल करती हो, तुम जो दिन-रात कांव-कांव करती हो तो मैं कैसे सालों से जी पा रहा हूं। चैन क्या बाजार में मिलती है?’

बस, फिर क्या था, बात ने तूल पकड़ लिया। सुलह-सफाई की जो थोड़ी बहुत उम्मीद और गंजाईश थी, वह भी हवा हो गयी।

बबली सोच रही थी, बात क्या इतनी बड़ी है इतना हंगामा हो रहा है? बोजो ने भी दिमाग लगाया और साचेने लगा कि उसे तो सब प्यार करते हैं, फिर चंदू को लेकर इतनी मारामारी क्यूं है। कूं कूं तो वह भी कभी कभार करता ही है। फिर कांव-कांव को लेकर क्या परेशानी है। भों भों तो वह हमेशा ही करता है। उससे कोई नाराज नहीं होता। फिर, बोजो को यह भी भरोसा था कि चंदू छोटा सा ही तो है। एक बार गलती हो गई। उसे समझा दिया जायेगा तो कांव-कांव नहीं करेगा।

इधर मसला सुलझता हुआ दिख नहीं रहा था। बबली की मम्मी ने कहा, ‘पता नहीं कब तक इस कौवे के बच्चे के पंख निकलेंगे और कब तक यह उड़ पायेगा। फिर यह रहेगा कहां और इसकी पौटी कौन साफ करेगा। और अम्मा तो कौवे को बड़ा अशुभ भी मानती हैं। काला रंग होता भी तो अशुभ ही है। मगर कौवे का बच्चा है भी अभी बहुत छोटा। इसको बाहर छोड़ भी नहीं सकते। फिर, शायद बबली के दिल पर कहीं इसका असर न हो जाये। क्या करें...’

बबली की मम्मी, बबली से बहुत प्यार करती थी और वह कभी बबली को दुखी नहीं करना चाहती थी मगर करें भी तो क्या। यह चंदू है तो कौवा ही, वह भी काला...!

यह बात सभी जानते हैं कि लालच बुरी बला है। मगर, सवाल है कि जब बड़े भी अपना लालच संभाल नहीं पाते तो भला चंदू कैसे करता। वह तो अभी बच्चा ही था और वह भी कौवा। अरे, तो क्या हुआ, बोजो को यह बात क्या नहीं पता थी कि लालच नहीं करना चाहिये मगर वह भी तो अपने को रोक नहीं पाता था जब बबली की मम्मी संडे को चिकन बनाती थी। वह तो किचन से हिलता भी नहीं था, भले बबली की मम्मी उस पर कितना भी चिल्लाती।

खैर, अब जो हुआ सो हुआ। अब तो मसला यह था कि क्या जुगत लगायी जाये कि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे। यानि, चंदू भी घर में रह जाये और बबली की नानी भी राजी हो जायें।

अब देखिये, समस्या कोई अपने से तो आती नहीं। किसी न किसी तरह लायी ही जाती है, तो भला उसका समाधान और हल भी लाना ही पड़ता है। बोजो वैसे तो समझदार था मगर उसे क्या पता कि जब कोई बात बिगड़ती है, तो उसे बिगाड़ने में जितनी जुगत कुछ लोग लगा रहे होते हैं, उतनी ही तो उसे ठीक करने में भी कोई न कोई लगा ही रहा होता है। यही तो अच्छी बात है।

थोड़ी देर बाद जब हंगामा थोड़ा शांत हुआ तो बबली के पापा मुस्कुराते हुए बबली के नाना के पास बैठ गये और बेहद संजीदगी से बोले, ‘मैंने कहीं पढ़ा था कि कौवा भगवान का दूत होता है। जब कुछ भविष्य में अच्छा होने वाला होता है तो कौवा आ कर बता जाता है। अब कौवा कांव-कांव कर के क्या बताता है, यह जानना मुश्किल है। हो सकता है कि चंदू अगर हमलोगों के साथ कुछ दिन रहे तो हमलोग सीख पायें कि कौवे क्या और कैसे बोलते हैं। शायद चंदू हमारे भले की ही बात कहना चाहता हो।’

बबली के नाना ने बबली के पापा के मन की बात समझ ली और बोले, ‘देखिये, कौवा तो मूलतः भक्त और संत होता है। रामायण में काक भुसुंडी की चर्चा है। कौवा तो राम-राम ही करता है मगर उसकी आवाज ही ऐसी है तो कोई क्या करे। और तो और, संगीत की दुनिया में ‘कौंस’ मूल से ना जाने कितने ही बेहद सुरीले राग हैं - मालकौंस, चंद्रकौस, जोगकौंस, मोहनकौंस और भी ना जाने कितने ही। ‘क’ से तो कौशिक भी होता है, साक्षात शिव, सुदंर और सत्य के प्रतीक। फिर ‘क’ से कौवा कैसे बुरा हो गया भला! अब यह है कि भगवान सब को सुरीला थोड़ा ही बनाते हैं। अब देखिये, जरूरी यह है कि इंसान बेसुरा ना हो, जुबान अगर बेसुरी हो भी तो क्या फर्क पड़ता है।‘

बस हो चला। बबली की नानी फिर बिफर पड़ीं। एक बार फिर घमाशान मचा। बबली और बोजो चंदू को लेकर दूसरे कमरे में भाग लिये। चंदू बेचारा तो इतना डर गया था कि उसे तो यह भी याद नहीं रहा कि वह बोजो को एक टुकड़ा बालूशाही खिलाने को कहता। बेचारे की तो इज्जत भी गई, बहुत फजीहत हुई और जिसकी वजह से हुई, वह भी नसीब नहीं हुआ - माया मिली ना राम!

हालांकि, पूरे मामले में चंदू के छोटे से दिमाग में यह बात आ गई कि कोई क्या और कैसे बोलता है, इस बात का बहुत असर होता है। इसलिये, चंदू ने तय किया कि अब वह बहुत सोच-समझ कर ही कुछ बोलेगा। मगर फिर भी, यह बात उसके समझ में नहीं आ पायी कि कांव-कांव बोलने से बबली की नानी को इतनी तकलीफ क्यूं है और अगर वह काला है तो इसमें मुसीबत क्या है। उसने बोजो से यह बात पूछी भी मगर बोजो ने उसे प्यार से समझाया कि जो बात बड़े समझ सकते हैं, वह उसके जैसे बच्चे नहीं समझ सकते। उसके लिए उन्हें बड़ा होने का इंतजार करना पड़ता है।

खैर, चंदू मान भी गया। मानता नहीं तो और करता भी क्या। सारी आग तो उसी की वजह से लगी हुई थी। समझदारों की दुनिया में सबसे मूर्ख भी तो चंदू ही था। वैसे तो अमूमन मूर्ख मानते नहीं, मगर चंदू बेचारा सहमा हुआ था, इसलिए मान गया।

इधर बबली का दिमाग लगातार चल रहा था। उसनें ठान लिया था कि किसी भी हाल में वह अपने डाॅगी दोस्त बोजो की चाहत पूरी करेगी। उसने एक प्लान बनाया। रात में जब सब सो गये तो बबली ने अपने कमरे में बोजो और चंदू को अपने पास बिठाया और अपने पूरे प्लान की जानकारी दी। बोजो ने सर हिलाकर मंजूर किया कि उसे जो काम बबली ने दिया है वह उसे पूरी रात जाग कर, कर के ही छोड़ेगा। चंदू भी मरता क्या ना करता, उसनें भी सर हिलाकर चुपचाप मान लिया कि वह अपनी पूरी और ईमानदार कोशिश करेगा। पूरी रात बबली, बोजो और चंदू जागते रहे और अपने प्लान के मुताबिक सब कुछ ठीक से करते रहे।





दूसरी सुबह जब सब लोग जागे और बबली की मम्मी के कमरे में सब चाय पी रहे थे कि बबली लाल रंग का एक बड़ा बासकेट ले कर आयी। उसमें कोई चीज बिलकुल सफेद हिलडुल रही थी। अरे, यह तो चंदू ही था! बबली ने उसे उजले रंग में रंग दिया था। उसके बाद तो और भी कमाल हो गया! चंदू ने बबली की नानी की ओर देखा और बोला, ‘नानी अम्मा प्रणाम’। फिर चंदू बबली की मम्मी की ओर मुड़ा और बोला, ‘मम्मी जी गुड मार्निंग’। फिर वह बोजो की ओर देखने लगा। बोजो ने राहत की सांस ली। रात भर जो उसने चंदू को रटवाया था, नामुराद ने सही-सही बक दिया था। बबली तो खुशी से ताली पीटने लगी।

फिर क्या था, सबने बारी-बारी से चंदू को गोद में ले कर दुलार किया। बबली की नानी भी सबको खुश देखकर हंसने लगी। नानी ने कहा, ‘चलो ठीक है, चंदू रह सकता है घर में मगर, जैसे बबली और बोजो ने मिल कर चंदू को बोलना सिखाया है, वैसे ही हम सब मिलकर चंदू को उड़ना भी सिखायेंगे ताकि वह जल्दी से अपनी मम्मी के पास वापस उड़ कर चला जाये।’

बबली की नानी की बात पर सबने मिलकर तालियां बजाई। बबली के नाना भी कहां मौका छोड़ने वालों में से थे। उन्होंने छूटते ही कहा, ‘काश मैं भी उड़ना सीख पाता तो चंदू की तरह अपनी मम्मी के पास जा पाता।’ बस, लीजिये, हो चला एक बार फिर से वही सब...!

मगर, बबली की नानी कहां पीछे रहने वाली थीं। उन्होंने भी मौका देख कर, चंदू को अपने हाथों में ले कर कहा, ‘काश कुछ काले इंसानों को भी उजले रंग से रंग देने से वह अच्छा बोलना सीख पाते...।’

अब समझिये कि बात निकली तो बहुत दूर तक गयी। मगर सब ने, चंदू के बहाने ही सही, एक दूसरे की टांग खींच कर खूब मजे किये। दिलों की बातें, भड़ास में ही सही, हंसी-खुशी जुबां पर आ जाये तो अच्छा ही होता है। चंदू के भाग्य से छींका टूटा, मगर मलाई सबने मारी...!

इस बार लेकिन चंदू घबराया नहीं और उसने शांत भाव से बोजो को इशारे में कुछ कहा। बोजो भी बेचारा क्या करता। उसने वादा जो किया था। लोगों की नजर बचा कर बोजो ने फ्रिज खोलकर बालूशाही का एक टुकड़ा उठाया और चुपचाप अपने कमरे में चला गया। इस चंदू के बच्चे ने इतना सब बोलना सीखा भी था तो इसी शर्त पर कि बोजो उसे उसका फेवरेट व लजीज बालूशाही खिलायेगा। लालची कहीं का...!

मगर, बोजो खुश था। दोस्त के लिए तो यह सब करना ही पड़ता है। फिर चंदू ने भी तो उसकी बात मानी थी और उसकी मेहनत को सफल कर दिया था। और फिर, बबली ने भी तो बोजो को फ्रिज से निकाल कर चिकन खिलाया था। दोस्तों के लिए तो यह सब करना ही पड़ता है।





खैर, हंगामा हुआ और टेंशन भी बहुत हुआ मगर, बोजो के दिमाग में यह समझ आ गयी कि दो चीज जिंदगी में बहुत जरूरी है। पहला तो यह कि समस्या कैसी भी हो और कितनी भी बड़ी हो, हल तभी होती है जब सोच-विचार कर दिमाग लगाया जाये और मेहनत की जाये। दूसरी अहम बात यह समझ में आयी कि अच्छा परिवार वही होता है जो आपस में भले ही थोड़ा-बहुत लड़ता-झगड़ता है, मगर, एक-दूसरे की खुशी के लिए परवाह करता है और साथ-साथ हंसता-मुस्कुराता है।

दूसरी सुबह, बोजो ने बबली को बेहद गंभीरता से कहा कि वह अब बड़ा हो गया है, मगर, चंदू को अभी टाईम लगेगा...! बोजो ने बेहद दार्शनिक अंदाज में बबली से कहा कि खैर, बबली को इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं है क्यूं कि वह तो घर पर ही रहेगा, चंदू के साथ। अच्छा है कि बोजो को स्कूल या आफिस नहीं जाना पड़ता...



About The Author





People say, what conspire to make you what you finally become are always behind the veil of intangibility. Someone called it ‘Intangible-Affectors’. Inquisitiveness was the soil, I was born with and the seeds, these intangible-affectors planted in me made me somewhat analytical. My long stint in media, in different capacities as journalist, as brand professional and strategic planning, conspired too! However, I must say it with all innocence at my behest that the chief conspirators of my making have been the loads of beautiful and multi-dimensional people, who traversed along me, in my life journey so far. The mutuality and innocence of love and compassion always prevailed and magically worked as the catalyst in my learning and most importantly, unlearning from these people. Unconsciously, these amazing people also worked out to be the live theatres of my experiments with my life’s scripts. I, sharing with you as a writer, is essentially my very modest way to express my gratitude for all of them. In my stupidities is my innocence of love for all my beautifully worthy conspirators!

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यूं ही बेसबब



यह एक बंदिश है, शब्ददारी की अल्हड़ रागदारी है, सात-सुरों के तयशुदा श्रुतियों की ख्याल परंपरा से अल्हदा आवारगी का नाद स्वर है, गढ़े हुए बासबब लफ्जों से इतर स्वतः-स्फूर्तता का बेसबब बहाव है, ठुमरिया ठाठ की लयकारी के सहेजपनें से जुदा सहज-सरल-सुगम आह्लाद है, मूर्त की दहलीज से परे अमूर्त की अनुभूतियों की बेसायदार अभिव्यक्ति है। आप ही से आसनाई को मुंतजिर है यह ‘शब्द-संगीत’, यूं ही बेसबब... चले आइये...

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बेवजह, बेसबब भी, कुछ होने की स्थिति को स्वीकारना आसान नहीं होता। अपनी खुदी की अवश्यमभाविता व सतत् उपयोगिता की बदगुमानी अवचेतन में इतने गहरे बसी है कि बेखुदी, बेसबब ही घबराहट पैदा कर देती है। यूं तो अपना वजूद ही दुनिया का सबसे व्यापक भ्रम माने जाने की हमारी विस्तृत परंपरा रही है, और अब विज्ञान भी इसकी पुष्टि करता है, फिर भी, मैं-बोध की असीम दुविधा के बावजूद भी, बेसबब व बेखुदी की आमदगी से हम सब असहज से रहते हैं। अमूमन, इसे फिलासफी या शेरो-शायरी करार दे कर, इसे यथार्थ से परे मान कर, तवज्जो नहीं देते।

सबब, यानि वजह का अवैकल्पिक होना, या यूं कहें कि बेसबब को, स्वीकारना कठिन इसलिए भी है कि इंसानी दिमाग, जो हमारी चेतना का मूल मैकेनिज्म है, निश्चित तौर पर एक एक्शनेबल, यानि क्रिया-प्रधान व्यवस्था है। इंसानी चेतना मूलतः प्रतिक्रियावादी, रियैक्शिनरी है। इसलिए, जब किसी भी चीज की स्थिति बेसबब बन पड़ती है, तो हम सब के लिए उसकी स्वीकार्यता कठिन हो जाती है।

इस किताब के लेखन में, जो भी भाव, चेतना व अभिव्यक्ति है, उसे बेसबब का दर्जा देने का कोई सबब या कारण जानबूझ कर नहीं किया गया है। वह सब यूं ही बेसबब ही हुआ है। ऐसा क्यूं? यही तो आपसे विनयपूर्वक गुजारिश है। जो बेसबब हो, उसका सबब ही क्या...!

हां, चंद पलों के लिए ही सही, अगर चेतना व बोधत्व की पारंपरिक स्वीकार्यता से इतर कोई प्रज्ञता या प्रतीति आकार पा सके, तो फिर जो खूबसूरत सिलसिला निकल पड़ेगा, वही संभवतः इस किताब में दिख पड़े। हां, जो सबबी तौर पर दिखाने की कोशिश की गई है, वह है ‘स्त्री-भाव’ में लेखन...!

कहते हैं, सिर्फ हम इंसानों को ही अच्छे वक्त का इंतजार नहीं रहता, बल्कि वक्त को भी अच्छे इंसानों का इंतजार रहता है जो भविष्य की जमीन पर अपनी चेतना-बोधत्व के बीज से, संभावनाओं की फसल उगा सकें। वैसे ही, शब्दों को भी अच्छे पाठकों का इंतजार रहता है। आप ही की राह तक रहे हैं यह चंद शब्द, यूं ही बेसबब...

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